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________________ ( २१८ ) ॥ १४८ ॥ बिलपेड वडवडौ ॥ बिलeen asas इत्यादेशो वा भवतः ॥ किलपूने शङ्ख भने दडपड भे! आहे विट्ये थाय छे. शङ्ख । वडर | बिलवह ॥ ॥ १४९ ॥ लिपी लिम्पः ॥ लिम्पतेर्लिम्प इत्यादेशो भवति ॥ लिपू धातुने लिम्प येवो महेश थाय छे. लिम्प | ॥ १५० ॥ गुप्येर्विर- जड़ौ ॥ गुप्यतेरेतावादेशौ वा भवतः ॥ गुरु (गयु ४ थे। ) ने किए भने ड सेवा माहेश विश्स्ये धा 1. विरह । डद्द | पक्षे । गुप्छ | ॥ १११ ॥ पोहो णिः ॥ पे: वह इत्यादेशो यन्तो भवति ॥ क्रप् धातुने अवह भेवो व्यन्त महेश थाय छे. दहावे । प | करोतीत्यर्थः ॥ ॥ १५२ ॥ प्रदीपेस्ते अव-सन्दुम-सन्धुकान्भुत्ताः ॥ प्रदीप्यतेरेते चत्वार आदेशा वा भवन्ति ॥ प्रदीपू ने तेअव, सन्दुम, सन्धुक्क भने अब्भुत मेवा यार माहेश विहये थाय छे. तेआवइ । सन्दुमइ । सन्धुक्कइ । अब्भुत्तइ | पलीवइ ॥ ॥ ११३ ॥ लुभेः संभावः ॥
SR No.023387
Book TitleLaghu Ane Bruhat Prakrit Vyakaran
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDalichand Pitambardas
PublisherDalichand Pitambardas
Publication Year1905
Total Pages574
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
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