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________________ (१२७) ॥ २११ ।। उअ पश्य ॥ उअ इति पश्येत्यस्यार्थे प्रयोक्तव्यं वा ॥ पश्य (oyt) मा २५४ना अर्थमा उअ विधे याय छे. उअ निश्चल निफंदा भिलिणी-पत्तंमि रेहइ बलाआ । निम्मल मरगय-भायण परिहिआ सङ्ख-सुत्तिव्व ॥ पक्षे पुलआदयः ॥ ॥२१२॥ इहरा इतरथा ॥ इहरा इति इतरथार्थे प्रयोक्तव्यं वा ॥ इतरथा शहना अर्थमां इहरा विपे थाय छे. इहरा निसामन्नेहिं । पक्षे । इअरहा ॥ ॥२१३ ॥ एक्कसरिंअं झगिति संप्रति ॥ एक्कसरिअं झगित्यर्थे संप्रत्यर्थे च प्रयोक्तव्यम् ।। झग अर्थमा मते संप्रति (मराi) मा अर्थमा एक्कसरि श५-६ यारवामां आवे छे. एक्कसरिअं । झगिवि सांप्रतं वा ॥ ॥ २१४ । मोरउल्ला मुधा ॥ मोरउल्ला इति मुधार्थे प्रयोक्तव्यम् ।। मुधा (व्यर्थ ) २०६॥ अर्थमा मोरउल्ला २५-६ या२३. मोरउल्ला । मुधेत्यर्थः ॥ ॥२१५ ॥ दरार्धाल्पे ॥ दर इत्यव्ययमर्धार्थे च प्रयोक्तव्यम् ॥ अर्ध अर्थमा भने अल्प अर्थमा. दर अव्यय प्याराय छे. दर विभसि । अर्धेनेषद्धा विकसितमित्यर्थः ॥ .
SR No.023387
Book TitleLaghu Ane Bruhat Prakrit Vyakaran
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDalichand Pitambardas
PublisherDalichand Pitambardas
Publication Year1905
Total Pages574
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
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