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________________ ( १२१ ) ॥ १८८ ॥ आनन्तर्ये वरि ॥ आनन्तर्ये णवरीति प्रयोक्तव्यम् ॥ आनन्तर्य अर्थमां णवरि शब्द उभ्याशय छे. णवरि अ से रहु-वइ. णा || केचित्तु केवलानन्तर्यार्थयोर्णवरणवरि इत्येकमेव सूत्रं कुर्वते तन्मते. भावप्युभयार्थी ॥ ॥ १८९ ॥ अलाहि निवारणे ॥ अलाहीति निवारणे प्रयोक्तव्यम् ॥ निवारण अर्थभां अलाहि शह छे. भलाहि किं वाइएण लेहेण || ॥ १९० ॥ अण णाई नञर्थे ॥ अण णाई इत्येतौ नोर्थे प्रयोक्तव्यौ ॥ अण भने णाई या शह निषेध अर्थमा म्यावा. अणचिन्ति अममुणन्ती । णाईं करेमि रोसं ॥ ॥ १९९ ॥ माई मार्थे ॥ माई इति मार्थे प्रयोक्तव्यम् ॥ मा शहना निषेध३थी अर्थमा माई शब्द वापरतो. माझं काहीभ रोस । मा कार्षीद् रोषम् ॥ || १९२ | हद्धी निर्वेदे ॥ ही इत्यव्ययमतएव निर्देशात् हाधिकशब्दादेशो वा निर्वेदे प्रयोक्तव्यम् ॥ हाधिक् या सव्ययाने असे हड्डी मेवो महेश थाय छे. हद्धी हद्धी । हा धाहवाह ||
SR No.023387
Book TitleLaghu Ane Bruhat Prakrit Vyakaran
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDalichand Pitambardas
PublisherDalichand Pitambardas
Publication Year1905
Total Pages574
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
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