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________________ (७८) । ५ ॥ शुष्क स्कन्दे वा ।। अनयोः कस्कयोः खो वा भवति ॥ शुष्क भने स्कन्द श५-८ना एक मते स्क नो ख विक्ष्ये थाय. सुक्खे सुकं । खन्दो कन्दो ॥ ॥६॥श्वेटका ॥ वेटकादिषु संयुक्तस्य खो भवनि ॥ क्ष्वेटक विगेरे श-४ सयुत वो ख थाय. खेडभो । स्वेटकशब्दो विषपर्यायः ॥ घोटकः । खोडओ ॥ स्फोटकः । डओ ॥ स्फेटकः ॥ खेडओ ॥ स्फेटिकः । खेडिओ ॥ ॥७॥ स्थाणा वहरे ॥ स्थाणौ संयुक्तस्य खो भवति ॥ स्थाणु श शिव का वायॐ न होय, सारे संयुक्त वर्णन। (स्थ ) ख थाय छे. खाणू ॥ अहर इति किम् । थाणुगो रेहा ॥ ॥८॥ स्तम्भे स्तो वा ॥ स्तम्भशब्दे स्तस्य खो वा भवति ॥ स्तम्भ ! स्त त ख थाय छे. खम्भो । थम्भो । काष्ठादिमयः ॥ ॥९॥थ-ठा वस्पन्दे ॥ स्पन्दाभाववृत्तौ स्तम्भे स्तस्य थठौ भवतः ।। स्तम्भ शनी स्थिर मे अर्थ डाय सारे स्तनोट मने थ थाय छ. थम्भो । उम्भो ॥ स्तम्भ्यते । थाम्भजइ । उम्भिजइ ॥
SR No.023387
Book TitleLaghu Ane Bruhat Prakrit Vyakaran
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDalichand Pitambardas
PublisherDalichand Pitambardas
Publication Year1905
Total Pages574
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
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