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________________ भगवान बोले, कि-" वहाँ जाने में तुम्हारे सब की जान का खतरा है"। खन्धकाचार्य ने फिर पूछा, कि-" किन्तु इससे हमारा कल्याण होगा या नहीं ? " । भगवान ने फरमाया, कि-"तुम्हारे अतिरिक्त और सब का कल्याण होगा"। खन्धकाचार्य ने कहा, कि-" सब का कल्याण होने पर, मैं अपना ही कल्याण समअँगा"। वे पाँच-सौ साधुओं को साथ लेकर, कुंभारकट नगर के पास आये। कुंभारकट नगर का राजा दण्डक था। उसके प्रधान का नाम था-पालक । एक बार व मंत्री, राजकुमार खन्धक के शहर को गया था, जहाँ वाद-विवाद में खन्धक ने उसे हरा दिया था। इसी कारण, उसके हृदय में खन्धक के प्रति शत्रुता के भाव थे। यों तो वह साधुमात्र का शत्रु था ही, उसमें फिर खन्धकाचार्य को देखकर तो उसके वैर की अग्नि और भड़क उठी । वह, किसी भी तरह इन साधुओं को ठिकाने लगाने का उपाय सोचने लगा। खन्धकाचार्य जिस बागमें ठहरनेवाले थे, उसमें उसने बहुत-से हथियार गड़वा दिये। ___ खन्धकमुनि, अपने शिष्यों सहित उसी बाग में आकर ठहरे । वहाँ, राजा, प्रधान तथा सब रिआया उनका उपदेश सुनने आई । इसके बाद, रात्रि के समय पालक प्रधान ने, राजा से जाकर कहा, कि-"महाराज ! यह खन्धक तो बड़ा
SR No.023378
Book TitleHindi Granthavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDhirajlal Tokarshi Shah, Bhajamishankar Dikshit
PublisherJyoti Karayalay
Publication Year1932
Total Pages398
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
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