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________________ (३०) तो कोई पण जीवने फुःख थाय एवां वचननी गुप्ति करे, एवां वचन बोले नहि, वली बोले ते पण एवं बोले के सोनलनारने वचन गुप्ति थाय.पोताने वचनगुप्तिथाय एवां वचन शास्त्र आधारे बोले,केमकेमौनपणुं धारण करे ते मुनि,माटे जेम परनावमां मौनपणुं थाय एवोनद्यम करे.लान सिवाय फोगट वाद विवादमां वचन प्रवर्तीवे नहि, केवल वचनरहितपणुं अजोगी गुणस्थानमा अने सिपणामां ने. संसारमा रहेला जीवने आवा अवसरमांप्रनुनो मार्ग मख्यो, तेथी जेम बने तेम वचन योगनुं गोपवq थाय एम करे, ते वचन गुप्ति. काय गुप्ति ते कायानी प्रवृत्तिने रोकवी. बीलकुल कायगुप्ति तो चनदमे गुणस्थाने थाय , ते गुणस्थान नश्री पाम्या त्यां सुधी पापना काममां कायाने प्रवर्ताववी नहि. कायगुप्ति प्राय एवा कारणोमां काया प्रवर्ताववी. जेटली जेटसी कायानी प्रवृत्ति रोकाय एम रोके, ते कायगुप्ति कहीए. जेम बने तेम आत्म नावमा वर्ने ने कायानी चपलता गेमे. स्वस्वनाव सन्मुख थाय तेमां जेटलो चेतन स्वन्नाव प्रगटे एटली गुप्ति थाय. ए रीते पांच समिति अने त्रण गुप्ति मली आठ चारित्रना श्राचार व्यवहारथी मन, वचन, कायानी प्रवृत्ति प्रनुनी आज्ञाए करवी, जेश्री आत्माना स्वनावनो आचार शुइ पाय. निश्चे चारित्राचार शुंने ? आत्मा आत्म स्वन्नावमा स्थिर श्राय, देहना स्वनावमा वर्ते नहि, कर्मनो नाश श्राय, आत्मा जेटलो जेटलो शुइ थाय तेटलो तेटलो चारित्राचार प्रगटे,ए चारित्राचार सर्व प्रकारे प्रगटे त्यारे सर्व कषाय जे क्रोध, मान, माया, लोन ने ते नाश पाय, अने यथाख्यात चारित्र प्रगटे. ए लान चारित्राचारनो अंतराय तुटे त्यारे प्राप्त थाय , अने जे जीवो चारित्रवंत पुरुषनी निंदा करे , अने बोले ले के खावापीवा न मन्यु, वेपार करतां न आवमयो, त्यारे साधु पईने बेग; एवं
SR No.023346
Book TitleAdhar Dushan Nivarak
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnopchand Malukchand Sheth
PublisherAnopchand Malukchand Sheth
Publication Year1903
Total Pages232
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size18 MB
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