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________________ * मूलम् । ___ एयं नाणं ति वुच्चइ । एयम्मि सुहजोगसिध्धी उचियपडिवत्तीपहाणा । एत्थ भावे पवत्तगे । पायं विग्यो न विज्जइ निरणुबंधासुहकम्मभावेण । अक्खित्ता उ इमे जोगा भावाराहणाओ तहा, तओ सम्मं पवत्तइ, निप्फाएइ अणाउले । एवं किरिया सुकिरिया एगंतनिक्कलंका नि -क्कलंकत्थ साहिया, तहा सहाणबंधा उत्तरूत्तरजोगसिध्धीए । तओ से साहइ परं परत्थं सम्म तक्कुसले सया तेहिं तेहिं पगारेहिं साणुबंध, महोदए बीजबीजादिट्ठावणेणं, कत्तिविरिआइजुत्ते, अवंझ सुहचेटे, समंतभद्दे, सुप्पणिहाणाइहेऊ, मोहतिमिरदीवे, रागामयवेज्जे, दोसाणलजलनिही, संवेगसिध्धिकरे हवइ अचिंतचिंतामणिकप्पे । से एवं परपरत्थसाहए तहा करूणाइभावओ अणेगेहिं भवेहिं विमुच्चमाणे पावकम्मुणा, पवढ्ढमाणे अ सुहभावेहि अणेगभवियाए आराहणाए पाउणइ सव्वुत्तमं भवं चरमं अचरमभवहेउं अविगलपर सावचूरि-सटीकानुवादं पञ्चसूत्रम् । 156
SR No.023169
Book TitlePanch Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHitvardhansuri
PublisherKusum Amrut Trust
Publication Year2017
Total Pages224
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size25 MB
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