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प्राकृत भाषाओं का साहित्य मागधी - पालि, अर्धमागधी, शौरसेनी, महाराष्ट्री, अपभ्रंश और अवहट्ठ भाषाओं में मिलता हैं । इन भाषाओं में शिष्ट साहित्य के रूप में कथा और काव्य ही नहीं परंतु दर्शन और तत्त्वज्ञान जैसे गंभीर विषयों पर भी साहित्य उपलब्ध है । अन्य विविध प्रकार के साहित्य की उपलब्धि से भी इन भाषाओं की सामर्थ्य - शक्ति सिद्ध होती है । लोक - प्रचलित अनेक राग और छंद तथा अनेक विधाओं का उपयोग और संरक्षण भी इसी परंपरा में हुआ है । भारतीय लोक-संस्कृति का सर्वाङ्गीण दर्शन भी इसी साहित्य से पूर्ण होता है ।
आर्य भाषाओं तक ही श्रमणों का क्षेत्र सीमित नहीं रहा परंतु द्राविडी भाषाओं को भी उनका योगदान रहा है । तामिल और कन्नड भाषाओं के प्राचीनतम साहित्य में भी श्रमणों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है ।
1. प्राकृत भाषाओं में उपलब्ध श्रमणों का विविध प्रकार का साहित्य और उसका महत्त्व
नीचे विषयवार विभाजन सामान्य तौर पर किया गया है । इसका अर्थ यह नहीं है कि अमुक ग्रन्थ में अन्य विषय मिलते ही नहीं अथवा अमुक विषय अन्य ही नहीं ।
ग्रन्थों में मिलते
(अ) पालि - मागधी (बौद्ध) साहित्य (६० स० पूर्व ६०० से ६०० ई० स० तक )
'अर्धमागधी आगम' की कुछ कृतियों के समान 'पालि (बौद्ध) त्रिपिटक' की भी कुछ कृतियाँ संस्कृतेतर साहित्य में प्राचीनतम