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________________ और अर्वाचीन लोक-भाषाओं में रचा गया । संस्कृत भाषा में साहित्य की जितनी विधाएँ प्राप्त हैं लगभग उतनी ही विधाएँ प्राकृत भाषाओं में भी प्राप्त है। इससे इन भाषाओं में संस्कृत के समकक्ष अभिव्यक्ति का सामर्थ्य है यह भी सिद्ध होता है। ये प्राकृत रचनाएँ भी भारतीय साहित्य में अपना एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है । किसी भाषा-विशेष के प्रति मोह नहीं होने के कारण श्रमण-परंपरा ने संस्कृत भाषा को भी अपनाया । श्रमणों को जब यह प्रतोति हुई कि प्रचलित लोक-भाषा प्राकृत के माध्यम से सामान्य जनता तक तो पहुँचा जा सकता है परंतु विद्वानों की मंडली में अपने विचार पहुँचाने हो तो संस्कृत भाषा का प्रयोग भी आवश्यक है, तब उन्होंने इस भाषा में भी साहित्य का निर्माण करना शुरु किया और इस के फलस्वरूप इस भाषा में भी साहित्य के लगभग सभी प्रकारों की रचनाएँ मिलती है। उपलब्ध संस्कृत साहित्य में श्रमणों की संस्कृत रचनाओं का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है । भारतीय आर्य भाषाओं का ईसा पूर्व पाँचवीं शती से आज तक का क्रमिक विकास जानने के लिए श्रमण-साहित्य (खास कर के जैनों की कृतियाँ) ही मुख्य साधन है और इस दिशा में श्रमणों की बड़ी ही महत्त्वपूर्ण देन है । कुछ श्रमणेतर प्राकृत रचनाएँ प्राप्त हैं परंतु उनमें से अधिकतर कृतियाँ संस्कृत भाषा में सोचकर शिष्ट प्राकृत भाषाओं में उतारी गयी हैं, अतः उनमें मूल लोक भाषाओं के वे स्वाभाविक तत्त्व नहीं मिलते जो श्रमण साहित्य में उपलब्ध हैं । गुजराती, राजस्थानी, हिन्दी आदि आधुनिक भाषाओं का प्रारंभिक साहित्य (खास कर जैनों) श्रमणों द्वारा ही रचा गया है और श्रमण लोग इसीलिए इन साहित्यों के आदि सर्जक कहलाते हैं।
SR No.022869
Book TitleBharatiya Bhashao Ke Vikas Aur Sahitya ki Samruddhi Me Shramano Ka Mahattvapurna Yogdan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorK R Chandra
PublisherPrakrit Jain Vidya Vikas Fund
Publication Year1979
Total Pages34
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size3 MB
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