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समझी जाती है । 'पालि त्रिपिटक' के मुख्य तीन विभाग हैं'सुत्त', 'विनय' और 'अभिधम्म' । 'सुत्त पिटक' में सरल पद्धति से भगवान बुद्ध के सिद्धान्त समझाये गये हैं । 'विनय पिटक' में आचार और संघ संबंधी नियम है तथा प्रायश्चित्त और शिक्षा (सज़ा) सम्बंधी विधान है। 'अभिधम्मपिटक' में सूक्ष्म दृष्टि से तत्त्वज्ञान समझाया गया है । इनमे से कुछ ग्रन्थों की विशेषता इस प्रकार है :___ 'थेर-गाथा' और 'थेरी-गाथा' में हमें गीतिकाव्य के दर्शन होते है', 'अंगुत्तर-निकाय' में विषयों का संख्यात्मक वर्गीकरण मिलता है, 'धम्मपद' उपदेशात्मक सूक्तियों का एक अद्भुत प्रन्य है । 'बुद्धवंश' में २४ बुद्धों की जीवनी मिलती है और 'चरियापिटक' में बुद्ध के पूर्व-भव को कथाएँ हैं। 'अभिधम्म' में चित्त का विश्लेषण उत्तम ढंग से हुआ है । प्रियदर्शी अशोक के द्वारा उत्कीर्ण किये गये लेख भी प्राचीनतम ‘पालि-लेख' है।
'त्रिपिटक' के बाद 'मिलिन्दपन्हो' को दार्शनिक और संवादात्मक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है ।
'त्रिपिटक' ग्रंथों के टीका साहित्य में 'पालि अट्ठकथाएँ' आती है जिनकी रचना मुख्यतः बुद्धदत्त, बुद्धघोष और धम्मपाल द्वारा की गयी है। 'जातक-अट्ठ-कथा-ग्रंथ' लोक-कथाओं का अद्वितीय खज़ाना है जिसमें रोमांचकारी, नैतिक, विनोदात्मक, धार्मिक और पशु-कथाएँ मिलती है।