________________
चलता रहा है । तिरुक्कुरल में श्रमणों की सन्त परम्परा का अधिक प्रभाव देखने को मिलता है । इसके अतिरिक्त 'उल्लोयनार नाम के जैन कवि और 'इलम् पोतियार' नाम के बौद्ध कवि संगम - काल के ही माने जाते हैं ।
संगम-काल स्फुट कविताओं का युग था परन्तु उसके बाद बृहत् काव्यों की रचना हुई जिस पर श्रमणों का प्रभाव स्पष्टतः दृष्टिगोचर होता है । इस काल के सर्वश्रेष्ठ माने जाने वाले पाँच काव्य हैं - 'शिलप्पदिकारम्, 'मणिमेकलै', 'जीवक चिन्तामणि', 'लैयापदि' (लुप्त) और 'कुण्डलकेश' । कथानक की दृष्टि से मणिमेकलै शिलप्पदिकारम् का उत्तरार्ध माना जाता है । शिलप्पदिकारम् में बौद्ध धर्म का ओजस्वी चित्र काव्यमय शैली में खींचा गया है । जीवकचिन्तामणि नवीं शती के महाकवि जैन मुनि 'तिरुतक्कत्तेवर' की रचना है । कुंडलकेशि के रचनाकार बौद्ध नाथगुप्त थे । इसमें बौद्धमत की स्थापना की गयी थी । यह अनुप • लब्ध है ।
'नालदियार' एक नीतिग्रंथ है जिसके कर्त्ता जैन थे । इसमें सांसारिक सुखों की अनित्यता और संत जीवन की प्रशंसा की गयी है । इसका समय पाँचवीं शती का माना जाता है ।
ईसा की नवीं शताब्दी के बाद जैनों के अनेक तामिलसंस्कृत मिश्रित मणि-प्रवाल शैली में गद्य ग्रंथ मिलते हैं - जैसे 'श्रीपुराण', 'गद्यचिन्तामणि', इत्यादि ।
1
तामिल कोषों में तीन कोष महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं, वे हैं - 'दिवाकरनिघंटु' (अनुपलब्ध), 'पिंगलनिघंटु' और 'चूडामणिनिघंटु' | ये तीनों ही जैनों की कृतियाँ हैं ।