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________________ २६ हुआ है और वे इस प्रकार है-'तत्त्वार्थ' पर श्री वर्धदेव' या 'तुंबुलूराचार्य' की कन्नड 'चूडामणि टीका,' 'श्याम कुन्दाचार्य' का 'प्राभृत ग्रन्थ', 'भ्रजिष्णु' की 'आराधना' पर 'टीका', 'असग' (ई.स. ८५४) का ‘वर्धमान-चरित' इत्यादि। उपलब्ध साहित्य में 'कविराजमार्ग' के बाद 'वड्डाराधने' का क्रम आता है जो ई. स. ९२० की रचना है। यह कन्नड साहित्य की प्रथम उपलब्ध गद्य कृति है जो 'भगवतो-आराधना' पर आधारित है। इसमें अनेक कथाओं का संग्रह है। बाद की गद्य कृति 'चावूडरायपुराण' (त्रिषष्टिपुरुष) है जिसकी रचना चाकुंडराय ने ई. स. ९७८ में की थी । लगभग इसी काल दरमियान तीन महाकवि हुए जिन्होंने चम्पू-काव्यों की रचना की : 'पम्प' का 'आदिपुराण' (ई.स. ९४०). 'पोन्न' का 'शांतिपुराण' (ई. स. ९५०), जौर 'रन्न' का 'अजितपुराण' (ई. स. ९९३)। पंप कन्नड साहित्य के आदिकवि माने जाते हैं। उन्होंने जैन धर्म सम्बंधी साहित्य के सिवाय 'विक्रमार्जुनविजय' काव्य भी लिखा। इस युग को ‘पंपयुग' भी कहा जाता है । रन्न की लौकिक विषयों पर रचनाएँ मिलती है जैसे-गदायुद्ध (चम्पू) और रन्नकंद निघंटु) । 'नेमिचन्द्र' को ई० स० ११७० की 'लीलावती' कथा मिलती है। इसके अतिरिक्त अनेक धार्मिक टीका-ग्रन्थ उत्तरोत्तर काल के मिलते हैं। ___तामिल साहित्य का 'संगम काल' बहुत प्राचीन माना जाता है परन्तु उस काल की कृतियाँ नष्टप्रायः हो गयी है । तोलकाप्पियम्' (व्याकरण ग्रंथ) और 'तिरुक्कुरल' (उपदेशात्मक ग्रंथ) उस काल की बची हुयी रचनाएँ मानी जाती है । इन दोनों ही ग्रंथों को श्रमण और ब्राह्मण दोनों अपनी अपनी कृतियाँ मानते हैं। इनके कर्ता और समय के विषय में वादविवाद
SR No.022869
Book TitleBharatiya Bhashao Ke Vikas Aur Sahitya ki Samruddhi Me Shramano Ka Mahattvapurna Yogdan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorK R Chandra
PublisherPrakrit Jain Vidya Vikas Fund
Publication Year1979
Total Pages34
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size3 MB
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