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२५ कृतियों में मराठी भाषा के अदिम दर्शन करते है । "कहने का तात्पर्य यह है कि जैनों और बौद्धों ने लोक भाषायें अपनायीं
और उन भाषाओं में उनका ई. पू. छठी से ई. स. पन्द्रहवीं शती तक का जो क्रमबद्ध साहित्य मिलता है उसमें आर्य भाषाओं के २००० वर्ष तक के विकास की व्यवस्थित और विशद सामग्री मिलती है जो श्रमणेतर साहित्य में शायद ही मिलती है और इसमें अनेक नयी-नयी साहित्य-विधाओं के दर्शन भी होते हैं"। ५. द्राविड़ी भाषाओं और साहित्य को श्रमणों का प्रदान
जैन-श्रमणों ने भद्रबाहु के साथ दक्षिण में जाकर वहाँ पर अपना साहित्य-सृजन प्रारम्भ किया था। उसके कारण कन्नड भाषा और तामिल भाषा प्राकृत शब्दावली से समृद्ध बनी। प्राकृत ग्रन्थों पर कन्नड टीकायें लिखी गयीं इससे कन्नड़ भाषा में अनेक प्राकृत शब्द आये। कन्नड़ साहित्य के कालक्रम से तीन विभाग किये जाते हैं। उनमें से पहला विभाग ५वीं से १२वीं शती तक का माना जाता है और उसे 'जनयुग' कहा जाता है। इस युग की लगभग सभी कृतियाँ जैनों की ही मिलती है। बोलचाल की भाषा को इधर भी, इस प्रदेश में भी साहित्यिक दर्जा दिलवाने, उसे उन्नत और प्रौढ़ स्थिति प्राप्त करवाने का श्रेय श्रमणों को ही है और इसीलिए श्रमण (जैन) ही कन्नड भाषा के आदि कवि माने जाते हैं। ___कन्नड साहित्य का प्रथम उपलब्ध ग्रन्थ श्रमणों की रचना है। वह है नृपतुंग द्वारा रचित 'कविराज-मार्ग' जो एक अलंकार (ई.स. ८१४-८७७) ग्रन्थ है। इसमें अनेक पूर्व कवियों के उल्लेख है और उनमें 'दुविनीत' का नाम भी है जो गंगवंशीय राजा थे और उनका राज्यकाल ई.स. ४८७ से ५१३ तक था। सातवीं शती के भी कुछ ग्रन्थों का उल्लेख अन्यत्र