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___ यह सभी साहित्य जैनों का है और गुजराती तथा राजस्थानी के विद्वान् इस साहित्य को अपनी-अपनी भाषा का आदिकालीन साहित्य मानते हैं । यहाँ तक कि जो गद्य कृतियाँ ऊपर बतलायी गई हैं वे गुजराती और राजस्थानी की आदि गद्य कृतियाँ मानी जाती हैं। इस प्रकार की साहित्य विधाओं का सर्जन गुजराती और राजस्थानी में काफी समय तक होता रहा । १३वीं से १५वीं शती तक राजस्थानी और गुजराती भाषा एक ही थी, अतः दोनों भाषावाले इन कृतियो में अपनी अपनी भाषा की प्रारम्भिक अवस्था के दर्शन करते है और इन में ही मारवाड़ी, मेवाड़ो, ढूँढाणी, मेवाती, हाड़ौती, मालवी, निमाड़ी आदि भाषाओं का समावेश करते हैं।
हिन्दी भाषा के विद्वान् भी इस (रास, फागु, चर्चरी आदि के) जैन साहित्य को हिन्दी का आदिकालीन साहित्य मानते है। पहले वीरगाथाकाल हिन्दी का प्रारम्भिक साहित्य माना जाता था
और 'वीसलदेव-रासो' तथा 'पृथ्वीराज-रासो' इत्यादि हिन्दी की आदिकृतियाँ मानी जातीथीं परन्तु अब उपर्युक्त रास और फागु कृतियों में हिन्दी भाषा के आदिम दर्शन किये जाते है।
रल्ह की जिनदत्त चौपाई (१२९७) को श्री अगरचन्दजी नाही बृजभाषा की पुरानी कृति मानते है जो सधारु के प्रद्युम्नचरित (१३५४) से पहले की है । राजसिंह का जिनदत्तचरित (१२९७) पुरानी हिन्दी का प्रथम बड़ा ग्रन्थ माना जाता है । पश्चिमी हिन्दी के गद्य का नमूना 'उपदेशमाला' पर लिखी गयी सोमसुन्दर की टीका (१५वीं शती का प्रथमपाद) में मिलता है। हिन्दी की प्राचीनता के दर्शन बौद्ध सिद्धों के दोहा-साहित्य में (८ से १२ वीं शती) और पुष्पदंत तथा स्वयंभू (जैनों) की अपभ्रंश कृतियों में भी कराये जाते हैं। कुछ विद्वान् पुष्पदंत की