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इस विवरण से स्पष्ट है कि श्रमणों ने साहित्य-सृजन की परम्परा को अक्षुण्ण बनाये रक्खा है और उन्होंने लोक-भाषाओं को उतना ही महत्त्व प्रदान किया जितना शिष्ट भाषाओं को मिला है । साहित्य को नयी-नयी विधाएँ प्रदान करने में भी वे पीछे नहीं रहे । उनका २००० वर्ष का यह साहित्य भारत की अनेक भाषाओं के क्रमबद्ध विकास को जानने के लिए अत्यन्त उपयोगी और सर्वथा अनिवार्य है । इस साहित्य का आश्रय लिये बिना उस दिशा में एक कदम भी आगे बढ़ना त्रुटिपूर्ण गिना जाता है।