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रासा-युग कहा जाता है। इस युग में रास, चर्चरी, कागु, बारहमासा, छप्पय, विवाहलु, चउप्पई, कक्क, वर्णक, छन्द, विनती, धवलगीत, संवाद इत्यादि अनेक प्रकार की रचनाएँ लिखी गयीं।
इस साहित्य के विविध विषय लगभग परंपरागत ही थे, जैसे-पौराणिक, धार्मिक और ऐतिहासिक पुरुषों का चरित; रूपकात्मक और लौकिक कथाएँ; तीर्थ, प्रतिष्ठा, पूजा, स्तुति, तत्त्वज्ञान, उपदेश एवं सुभाषित । कथा, दार्शनिक चर्चा, धर्मसंवाद) वादविवाद, प्रश्नोत्तरी, व्याकरण इत्यादि का साहित्य गद्य शैली में मिलता है।
इस साहित्य की परंपरा १८वीं शती तक चलती रही और इसमें जैनों का योगदान लगातार बना रहा । इस युग की प्राचीनतम कृतियाँ इस प्रकार है जो सभी जैनों की रचनाएँ हैं :(क) 'रास' -भरतेश्वरबाहुबलिघोर-वज्रसेनसूरि (११६९)
भरतेश्वरबाहुबलिरास-शालिभद्र (११८५) (ख) “फागु'-जिनचन्द्रसरिफागु
(१२८५) स्थूलभद्रफागु-जिनपद्मसूरि (१३३४) (ग) 'बारहमासा'-नेमिनाथचतुष्पदिका-विनयचंद्र (१२७५) (घ) 'छप्पय'–उवएसमालकहाणयछप्पय-विनयचंद्र (१२७५)
खरतरगुरुगुणवर्णन-छप्पय (१५वीं शती) (ङ) 'विवाहलु'–जिनेश्वरसूरि-विवाहलु-सोममूर्ति (१२७५ के
पश्चात) (च) 'चर्चरी' –सोलणचर्चरी (गिरनारयात्रा) (१४वीं शती)
सम्यक्त्वचउप्पई-जगडू (१२७५) (छ) 'मातृकाच उप्पई'-गोराबादलचउप्पई-हेमरत्न (१५८०)