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________________ २१ अनेक ग्रंथों की रचना पद्य और गद्य में हुई हैं। हरिषेण (ई.स. ९३२) का 'बृहत्कथाकोष' (पद्य) और प्रभाचन्द्र (१३वीं शती) का 'कथाकोष' उदाहरण रूप है । काव्यात्मक दृष्टि से इनका इतना महत्त्व नहीं है जितना उपदेशात्मक दृष्टि से है। (ढ) 'द्वयाश्रय काव्य'-द्वयाश्रयी काव्य के रूप में 'भट्टिकाव्य' (हिन्दू) प्रथम गिना जाता है । हेमचन्द्राचार्य का ‘कुमारपाल-चरित' बाद का है परंतु इसकी विशेषता यह है कि इसमें (संस्कृत अंश) 'सिद्धहेमशब्दानुशासन' के सूत्र क्रमपूर्वक दिये गये है और इसमें पौराणिक कथा के स्थान पर ऐतिहासिक सोलंकी वंश का वर्णन किया गया है। (ण) 'छन्द'- हेमचन्द्र का 'छन्दोनुशासन' सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ माना गया है । इसे पूर्ववर्ती ग्रन्थों को ध्यान में रखकर रचा गया है । यह सबसे अधिक परिपूर्ण और अधिक विस्तृत है । उदाहरणों में ही उन उन छन्दों का नाम दिया गया है । ४. आधुनिक भारतीय आर्य भाषा-साहित्य को श्रमणों की देन लगभग १२वीं से १४वीं शती तक उत्तर भारत की आर्य भाषाओं में काफी परिवर्तन आया । मध्यकालीन भाषाओं और आधुनिक भाषाओं का यह संधि-काल माना जाता है। इस काल में अनेक गेयात्मक नवीन लोक-विधाओं का उद्धव हुआ और श्रमणों (जैनों) ने उन्हीं विधाओं में साहित्य का सृजन किया। इस काल की भाषा को अवहट्ट अथवा उत्तरकालीन अपभ्रंश भी कहते है । पश्चिमी प्रदेश की भाषा को पश्चिमी राजस्थानी, पुरानी गुजराती, मारु-गौर्जर और गौर्जर-अपभ्रश भी कहा गया है । इस पश्चिमी भाषा का १२वीं से १४वीं शती तक का साहित्य अधिकतर जैनों का ही रहा है और इस युग को जैन
SR No.022869
Book TitleBharatiya Bhashao Ke Vikas Aur Sahitya ki Samruddhi Me Shramano Ka Mahattvapurna Yogdan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorK R Chandra
PublisherPrakrit Jain Vidya Vikas Fund
Publication Year1979
Total Pages34
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size3 MB
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