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करनन्दि की रचना 'रामपालचरित' है जिसमें बंगाल के राजा रामपाल तथा रामचरित का वर्णन है। परंतु इसका समय ११वीं शती के बाद का है।
(घ) 'अनेक सन्धान काव्य'-मेघविजयगणि (जैन) (ई.स. १७०३) ने 'सप्तसन्धान' काव्य की रचना की जिसमें नौ सर्ग
और ४४२ श्लोक हैं। इसमें ऋषभ, शान्तिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ, महावीर तथा राम और कृष्ण का वर्णन है।।
सोमप्रभाचार्य (जैन) (ई.स. ११७७ ) का ‘शतार्थकाव्य' है जिसमें जैन तीर्थकर, हिंदू देव, अनेक राजा, इत्यादि का वर्णन एक हो पद्य से फलित होता है । इसे समझाने के लिए उनकी अपनी ही उस पर वृत्ति है।
(ङ) 'शब्दकोष'-'अमरकोष' संस्कृत का प्रथम कोष है जो एक बौद्ध कृति मानी जाती है।
(च) 'दर्शन-संग्रह' हरिभद्ररि का 'षड्दर्शनसमुच्चय' पहला ग्रंथ है जिसमें एक साथ अनेक दर्शनों का विवरण मिलता है । 'सर्वदर्शनसिद्धान्तसंग्रह', 'सर्वदर्शनसंग्रह' और 'सर्वमतसंग्रह' बाद के है । हरिभद्र के इस ग्रंथ में जैन, बौद्ध, नैयायिक, सांख्य, वैशेषिक, जैमिनीय (पूर्वमीमांसा) और लोकायत दर्शनों का वर्णन है ।
(छ) 'योगप्रक्रिया'-असङ्ग का 'योगाचारभूमि' (बौद्ध) (तीसरी चौथी शती) योगप्रक्रिया का प्रथम ग्रंथ माना जाता है ।
(ज) 'चरित-संग्रह'-सभी पौराणिक महान पुरुषों के चरितो को एक ही कृति में ग्रंथस्थ करने को यद पद्धति है। जिनसेन-गुगभद्र (जैन) का 'महापुराग' और हेमचन्द्र का 'त्रिषष्टिशलाका-पुरुष-चरित' उल्लेखनीय हैं। ऐसे ग्रन्थों को जो विशेषता है वह ऊपर बतला दी गयी है।