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नाटक खंडित अंशों में उपलब्ध है उसका भी रूपक - साहित्य में प्रथम स्थान है ।
(ब) 'ललित - काव्य' - अश्वघोष का 'बुद्धचरित' प्रथम ललित काव्य माना जाता है । चरित संज्ञावाले काव्यों या कृतियों में भी इस का प्रथम स्थान प्राप्त है ।
(स) 'उपदेशात्मक कथा-काव्य ' - इस वर्ग में 'अवदान - शतक', 'दिव्यावदान' (बौद्ध) आदि को प्रथम स्थान मिलता है । इसमें त्याग, दान, पुण्य, पाप आदि और पूर्व कर्मों का फल दिखाया गया है ।
(द) 'रूपकात्मक - कथा - काव्य' - ' उपमितिभवप्रपञ्चाकथा' (जैन जिसकी रचना ई० स०९०६ में हुई है संस्कृत साहित्य में इस प्रकार की यह अद्भुत रचना मानी जाती है ।
(क) 'सुभाषित संग्रह ' - ' कवीन्द्रवचनसमुच्चय' १०वीं शती के अन्त की एक बौद्ध रचना है जिसमें अलग अलग विषयों पर सुभाषितों का संग्रह है । यह इस प्रकार की प्रथम रचना मानी जाती है । नन्दन का ' प्रसन्नसाहित्य रत्नाकर' इसका अनुकरण माना जाता है ।
(ख) ' स्तोत्र' - काव्यात्मक शैली में लिखे गये स्तोत्रों में मातृचेट (बौद्ध) का 'चतुः शतकस्तोत्र', 'शतपञ्चाशतकस्तोत्र' इत्यादि, सिद्धसेन (जैन) की 'द्वात्रिंशिकाएँ' और 'कल्याणमन्दिर-स्तोत्र' तथा समन्तभद्र का 'स्वयंभू-स्तोत्र' प्राचीन गिने जाते हैं । शंकर के स्तोत्र और बाण के चण्डीस्तोत्र आदि तो इनके बाद में बने है ।
( ग ) 'द्विसन्धान काव्य ' -- धनञ्जय (जैन) का 'राघवपाण्डवीय' काव्य इस प्रकार की रचना है जिसमें हिन्दू 'रामायण' और 'महाभारत' दोनों का अर्थ घटित होता है । इसका समय ९ वीं से ११ वीं शती माना जाता है । इस कोटि की सन्ध्या