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(ना) 'द्वयाश्रय काव्य-इस काव्य (प्राकृत अंश) की यह विशेषता है कि इसमें कुमारपाल के चरित के साथ साथ प्राकृत व्याकरण के नियम समझाये गये है। जैनों के सिवाय अन्य किसी को ऐसी कृति नहीं मिलती है जिसमें इस प्रकार प्राकृत व्याकरण समझाया गया हो ।
(ट) 'व्याकरण'-हेमचन्द्रसूरि का 'प्राकृत व्याकरण' (जैन) ही प्रथम ऐसा व्याकरण है जिसमें सभी साहित्यिक प्राकृत भाषाओं का (पालि के सिवाय) समावेश करते हुए उन्हें विस्तार• पूर्वक समझाया गया है।
(ठ) 'छन्द'-'स्वयंभूछन्दस्' (जैन)में प्राकृत और अपभ्रंश छन्दों का सर्वांगीण निरूपण मिलता है । हेमचन्द्र का 'छन्दोनुशासन' (जैन) भी श्रेष्ठ छन्द ग्रंथ माना गया है जिसमें उस उस भाषा में नाम सहित छन्दों के उदाहरण दिये गये हैं।
(ड) 'शब्द-कोष'-'पाइयलच्छीनाममाला' और 'देशीनाममाला' ही प्राकृत के शब्द कोष है । इनकी रचना जैनों ने की है। ३. उपलब्ध संस्कृत साहित्य में श्रमणों का महत्त्वपूर्ण प्रदान :
संस्कृत भाषा में साहित्यिक निर्माण करने में श्रमण लोग पीछे नहीं रहे । भाषा विशेष के प्रति कदाग्रह या मोह नहीं होने के कारण संस्कृत भाषा में भी उन्होंने लगभग सभी प्रकार की विधाओं में साहित्य का निर्माण किया । साहित्य के उन सभी प्रकार के उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं हैं। उपलब्ध भारतीय संस्कृत साहित्य में श्रमणों की संस्कृत कृतियों का कुछ महत्त्वपूर्ण प्रदान इस प्रकार है :___(अ) 'नाटक'-अश्वघोष (बौद्ध) का 'शारिपुत्रप्रकरण' भारतवर्ष में उपलब्ध नाटको' में प्रथम है । उन्हीं का एक रूपकात्मक