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(ङ) 'उपहासात्मक कथा' - हरिभद्रसूरि का 'धूर्ताख्यान' (जैन) इसी प्रकार की प्रथम स्वतंत्र और बेजोड़ उपहासात्मक रचना है जिसमें कथाओं द्वारा अन्धविश्वास पर व्यंग किया गया है ।
(च) 'संख्यात्मक वर्गीकरण' - 'अंगुत्तरनिकाय' (बौद्ध), 'स्थानांग, समवायांग' (जैन), इत्यादि में अनेक विषयों की जानकारी संख्यात्मक पद्धति में दी गयी है । इस प्रकार का कोई स्वतंत्र श्रमणेतर ग्रंथ ध्यान में नहीं है ।
(छ) 'संवादात्मक - सिद्धान्त - चर्चा' - पालि भाषा का 'मिलिन्द - पञ्हो (बौद्ध) ही एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें एक मात्र दार्शनिक विषय को संवादात्मक रूप में सुन्दर काव्यात्मक व सुव्यवस्थित
से प्रस्तुत किया गया है । इसकी विशेषता यह है कि इसमें अन्य किसी विषय की चर्चा नहीं हैं । इस प्रकार का इसके पहले का कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है ।
(ज) 'रूपकात्मक - काव्य' - ' मदनपराजय' (जैन) में काम, मोह, अहंकार, अज्ञान, राग-द्वेष, जिनराज आदि पात्र बनाये गये हैं और अन्त में जिनराज मुक्तिरूपी अंगना से विवाह करते हैं । यह पन्द्रहवीं शती की हरिदेव की रचना है । इस शैली के श्रमणेतर नाटक तो इससे भी प्राचीन मिलते है परंतु ऐसा कोई काव्य ख्याल में नहीं आया है ।
(झ) 'कर्म - साहित्य' - इस प्रकार का साहित्य तो श्रमणपरंपरा में ही उपलब्ध है । 'अभिधम्म ' (बौद्ध) में सूक्ष्म चित्त. विश्लेषण पाया जाता है और जैनों के महाबध, कम्मपयडी, इत्यादि में कर्म का सूक्ष्म विवेचन पाया जाता है ।