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१५ (क) 'पद्यात्मक-चरित'-चरित शीर्षक वाली पद्यात्मक कृतियों में 'पउमचरिय' और 'पउम-चरिउ' (जैन) प्रथम रचनाएँ है।
(ख) 'चम्पूकाव्य'– उपलब्ध चम्पू-काव्यों में 'समराइच्चकहा' और 'कुवलयमाला' का (जैन कृतियाँ) स्थान प्रथम है ।
(ग) 'अपभ्रश की नवीन विधाएँ'-उत्तर-अपभ्रंश अथवा अवहट्ट भाषा में जो नवीन प्रकार का साहित्य रचा गया वह श्रमणों का ही विपुल साहित्य है, श्रमणेतर साहित्य बहुत कम मिलता है और वह भी बाद का है । यह साहित्य दोहासाहित्य (बौद्ध), रास, फागु, चूनडी, चर्चरी, बारहमासा (जैन), इत्यादि है।
(घ) 'चरित-संग्रह'-इस प्रकार की रचनाओं में अनेक महापुरुषों के चरित एक ही ग्रंथ में दिये हुए होते है। चउप्पन्नमहापुरिसचरिय, कहावली, तिसट्ठिमहापुरिसगुणालंकारु (जैन) इत्यादि ऐसे हो ग्रन्थ है। पालि का 'बुद्धवंस' (बौद्ध) भी इसी प्रकार की रचना है । ये रचनाएँ 'पुराण' भी कहलाती है परंतु इनकी कुछ विशेषता है । हिन्दू पुराणों में शैलीगत शिथिलता
और कहीं कहीं पर अव्यवस्था और पुनरावर्तन भी होता है । इनमें जीवन-चरित के अलावा कितने ही अन्य पौराणिक विषयों का भरपूर वर्णन भी होता है । हरेक पुराण में मुख्य पात्र के रूप में एक या दो अवतारों का ही वर्णन होता है और काव्यास्मक शैली के सामान्यतः दर्शन नहीं होते । जब कि इन श्रमण चरित-संग्रहों में महान-पुरुषों के जीवन-चरित का एक ही जगह पर संग्रह मिलता है और उन्हें सामान्य या विशेष काव्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है । इस प्रकार ये रचनाएँ एक प्रकार से न्यूनाधिक रूप में पुराण और काव्यामत्क शैली का मिश्रण लिए हुए है।