SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 14
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १३ (५) रूपकात्मक काव्य (मदनपराजय, मोहराजविजय) (6) अध्यात्म, ध्यान एवं योग संबधी (बौद्धों का सिद्ध दोहा-साहित्य, जैनों का परमात्मप्रकाश, योगसार, पाहुडदोहा, इत्यादि) (७) श्रृंगार और वीर रस संबंधी (हेमचन्द्र के प्राकृत व्याकरण में प्राप्त उद्धरण) (८) संधिकाव्य (भावना-संधि-प्रकरण) (९) श्रावक धर्म (सावयदोहा) (१०) स्तोत्र (जयतिहुयण-स्तोत्र) (११) छन्द (स्वयंभू और हेमचन्द्र की कृतियाँ) रास, फागु, बारहमासा, छप्पय, विवाहलु, इत्यादि नवीन प्रकार (मुख्यतः जैनों) की अपभ्रंश रचनाएँ १२ वीं शती से मिलती है। ये उत्तरकालीन अपभ्रंश कृतियाँ मानी जाती है। आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के विद्वान इन्हें अपनी अपनी भाषा का आदि साहित्य मानते हैं । वास्तव में यह संधिकालीन साहित्य है और इसकी परंपरा आधुनिक भाषाओं के साहित्य में बनी रही, अतः इनकी चर्चा आगे आधुनिक भाषाओं के प्राचीन साहित्य के अन्तर्गत की गयी है। २. उपलब्ध प्राकृत साहित्य की भारतीय साहित्य को महत्त्वपूर्ण देन __ यहाँ पर 'प्राकृत-साहित्य' के अन्तर्गत 'पालि' और 'अपभ्रंश' साहित्य का भी समावेश किया गया है। भारतीय आर्य भाषाओं के आज़ तक के उपलब्ध साहित्य में श्रमणों के 'प्राकृत साहित्य' का कुछ महत्त्वपूर्ण और विशेष प्रदान इस प्रकार है: (अ) 'शिलालेख'–उपलब्ध शिलालेखों में सम्राट अशोक
SR No.022869
Book TitleBharatiya Bhashao Ke Vikas Aur Sahitya ki Samruddhi Me Shramano Ka Mahattvapurna Yogdan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorK R Chandra
PublisherPrakrit Jain Vidya Vikas Fund
Publication Year1979
Total Pages34
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size3 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy