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(४) क्रियाकाण्ड (विधिमार्गप्रपा, ई०स० १३०६, प्रवचन
सारोद्धार, १३वीं शती) (५) आचार(सावयपण्णत्ति, सावयधम्मविहि, पंचासक,
प्रवचनसारोद्धार, इत्यादि) (ख) अपभ्रंश साहित्य (ई० स० ८०० से १५०० तक)
प्राकृत साहित्य की परंपरा के अनुसार विविध विषयों और विधाओं में अपभ्रंश साहित्य का भी सृजन हुआ परंतु लोकशैली के प्रभाव के कारण उनके बाह्य स्वरूप और छन्दों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया । इस काल में संधि-काव्यों की नये नये छन्दों में रचनाएँ होने लगीं । गेयात्मक दोहा-साहित्य में एक नवीन प्रकार के साहित्य का उद्भव हुआ। यही प्रवृत्ति आगे चली और अनेक लोकप्रचलित राग और छन्दों का साहित्य में प्रयोग हुआ। इस उत्तरकालीन अपभ्रंश साहित्य को 'अवहट्ट' की संज्ञा दी गयी जो आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं का संधिकाल माना जाता है । इस अवहट्ठ साहित्य में भी अनेक नवीन विधाओं का उद्भव हुआ जिनकी परंपरा आधुनिक भाषाओं में भी कुछ काल तक बनी रही ।
अपभ्रंश भाषा (जैनों) का विविध प्रकार का साहित्य इस प्रकार है :(१) चरित (पउमचरिउ, नायकुमारचरिउ, अनेक तीर्थ कर
चरित इत्यादि) (२) चरित-संग्रह (तिसहिमहापुरिसगुणालंकारु) (३) कथाकोष (श्रीचन्द्र का कथाकोष, इत्यादि) (४) उपहासात्मक कथा (धम्मपरिक्खा)