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संमूर्छिम मनुष्य : आगमिक और पारंपरिक सत्य ऊपर धूल डालना वगैरह स्वरूप यतना भी अवश्य करनी चाहिए। यदि ऐसी यतना न की जाए तो (= यदि श्लेष्म-कफ वगैरह पर धूल न डाली जाए तो श्लेष्मादि यथातथ अवस्था में लंबे समय तक रहने से और न सूखने से) संमूर्छिम मनुष्य की उत्पत्ति और विराधना होने की आपत्ति आएगी ।
___ इस पाठ में “संमूर्च्छन-विराधनादिदोषः” - ऐसा कहने द्वारा स्पष्ट किया है कि संमूर्छिम मनुष्यों का संमूर्छन = जन्म भी श्लेष्मादि रूप अशुचि शरीर के बाहर आने के बाद ही होता है । एवं उनकी विराधना भी अपनी कायिक प्रवृत्ति से शक्य है ।
श्राद्धविधिकौमुदीकार ने उक्त बात पेश करने के पश्चात् उसके आगमिक आधार के रूप में पन्नवणा सूत्र का पूर्वदर्शित (पृ.६-७) आलापक ही प्रदर्शित किया है । इससे बहुत स्पष्ट होता है कि पन्नवणासूत्र के उक्त पाठ का अर्थ करने की प्राचीन परिपाटि संमूर्छिम मनुष्य की उत्पत्ति शरीरबहिर्निर्गत अशुचिओं में मानती है ।
यह ग्रंथकर्ता ५५० से अधिक वर्ष प्राचीन है। उनका उल्लेख भी अत्यंत साहजिक रूप से हुआ है । कोई विशेष प्रयोजन से या संमूर्छिम मनुष्य की परंपरा को सिद्ध करने के उद्देश्य से जान-बूझ कर किया गया यह प्रयोग नहीं है ।
ऐसे उल्लेख के पीछे चिंतन करने वाला अभ्यासु अवश्यमेव यह बात तो समझ जाएगा कि संमूर्छिम मनुष्यों की उत्पत्ति शरीर बहिर्निर्गत अशुचि में ही मानने की परंपरा नवीन शुरू नहीं हुई है, सैकड़ों भी नहीं लेकिन हज़ारों साल पुरानी है । ऐसा ओर भी एक उल्लेखश्राद्धप्रतिक्रमणसूत्रवृत्ति में मिलता है।
'श्लेष्मादीनां व्युत्सर्गेऽस्थगनाद्ययतनाऽपि प्रमादाचरितं मुहूर्तानन्तरं तत्र संमूर्छिममनुष्यसंमूर्छन-तद्विराधनादिमहादोषसम्भवात्...।'