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________________ यनी सूचना थाय जे. वनी ते ध्वनि 'आ प्रासाद जगत्मां अद्वितीय छे' एम जणावे छे. आ ध्वनिनो अवाज एटलो मोटो थाय ने के जेथी आकाश मार्गे जतां सूर्यना घोमाओ जमकी पोतानी लगाम तोमावे , एटने सूर्यनी गतिमां जंग थवाथी सूर्य तेनी निंदा करे . बीजी तरफ दश दिशाओमां रहेता दिग्गजो के जेओ हमेशा युद्ध करवानी इच्छा राखे छे, तेश्रो ते वखते समजे के, पोतानी सामे थयेला को बीजा गजेंनो आ ध्वनि , तेथी तेश्रो सामे थवाने तैयार थाय छे, पण ज्यारे को प्रति गजें तेमना जोवामां आवतो नथी एटले तेओ नाखुश थाय ने अने तेथी तेनी निंदा करे . आ नपरथी ते प्रासादमां धूप वाद्यना ध्वनिनी प्रौढता दर्शावी छे. ६५ कूपस्तंभानुकारं स्पृशति सितपटोनासितस्वर्णदंडे
SR No.022628
Book TitleKumarvihar Shatak
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRamchandra Gani
PublisherJain Atmanand Sabha
Publication Year1910
Total Pages254
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size12 MB
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