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________________ १५८] [ जीवन-श्रेयस्कर - पाठमाला. रागाउरे हरिणमिगे व मुद्धे, सद्दे अतित्ते समुवेइ मच्छु ||३७|| जे यावि दोसं समुवेइ तिव्वं, सिक्ख से उ उवेइ दुक्खं । दुहन्तदोसेण सपण जन्तू, न किञ्चि सो अवरज्झई से ||३८|| एगन्तरते रुद्ररंसि तद्दे, अतालिसे से कुराई पोसं । दुक्लम्स सम्पीलमुवेइ बाले, न लिप्पई तेल मणी विरागो ||३|| सद्दाणुगासाणुगए य नीबे, चराचरे हिंसइऽणेगरूत्रे चित्तेहि ते परितावे वाले, पीलेइ अट्टगुरु किलिट्टे ॥४०॥ सहा वाण परिग्गहेण, उपाय रक्खणसन्निश्रोगे । ar विश्रोगे य कहं सुहं से, संभोगकाले य अतितलामे ||४१ || सद्दे श्रतित्ते य परिग्गहम्मि, सत्तोवसत्तो न उवेइ तुट्ठि । अतुट्ठदोसे दुही परस्स, लोभाविले आययई अदत्तं ॥४२॥ तरहाभिभूयस् अदत्तहारिणो, सहे अतित्तस्स परिग्गहे य । मायामुखं वड्डर लोभदोसा, तत्थावि दुक्खा न विमुच से ||४३||
SR No.022602
Book TitleJivan Shreyaskar Pathmala
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKesharben Amrutlal Zaveri
PublisherKesharben Amrutlal Zaveri
Publication Year
Total Pages368
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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