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________________ भगवान पार्श्वनाथ । - देवोदासको डिगानेके लिए उकसाया । चौसठ योगिनी और बारह आदित्य इस प्रयासमें असफल हुये। आखिर महादेवके भेजे गनेशनी एक ज्योतिषिके स्वरूपमें आए। वैनायिकियोंकी सहायतासे उन्होंने काशीकी प्रनाकी रुचि बदलना प्रारम्भ की और उनको होनेवाले तीन अवतारोंके लिए तैयार किया। पहले ही विष्णु 'जिन' के खरूपमें आये, जिन्होंने वेदोंमें . बताए हुए यज्ञों, प्रार्थनाओं, तीर्थयात्राओं और क्रियाकांडोंका विरोध किया और बतलाया कि सत्य धर्म किसी जीवित प्राणीको न मारनेमें ही है । इनकी सहगामिनी (consort) जयादेवीने इस नये धर्मका प्रचार अपनी जातिमें किया। काशीके निवासी संशयमें पड़ गये । इनके बाद महादेव अर्हन् या महिमन्के रूपमें अपनी पत्नी महामान्यके साथ आए । महामान्यके अनेकों पुरुष स्त्री सेवक थे। इन्होंने 'जिन' प्रणीत सिद्धांतोंका समर्थन किया और अपनेको ब्रह्मा और विष्णुसे बढ़ चढ़कर बतलाया। स्वयं 'जिन' ने यह बात स्वीकार की। फिर दोनोंने ही मिलकर सारे संसारका भ्रमण और अपने सिद्धांतोंको फैलानेका उद्योग किया । आखिरको ब्रह्मासे भी न रहा गया और वह 'बुद्ध' के रूपमें आ अवतीर्ण हुए। इनकी सहगामिनी 'विज्ञ' थी। इन्होंने भी अपने पूर्वके दो अवतारोंके अनुसार उपदेश दिया और ब्राह्मणकी स्थितिसे रानाको बरगलाना शुरू कर दिया। दिवोदासने बड़ी रुचिसे इनका उपदेश सुना । परिणामतः उसे अपने राज्यसे हाथ धोने पड़े। महादेव खुशी२ काशी लौट आए। दिवोदासने गोमतीके किनारे एक दूसरा नगर बसाया। महादेवनीने काशीके लोगोंको समझानेके प्रयत्न किये, परन्तु सब
SR No.022598
Book TitleBhagawan Parshwanath Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamtaprasad Jain
PublisherMulchand Kisandas Kapadia
Publication Year1928
Total Pages208
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
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