SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 185
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ नवाँ अध्ययन : उपधान श्रुत मूलसूत्रम् - चौथा उद्देशक • चिकित्सा परिहार • ओमोदरियं चाएति अपुट्टे वि भगवं रोगेहिं । पुट्ठे वा से अपुढे वा णो से सातिज्जती तेइच्छं ।। पद्यमय भावानुवाद स्वस्थ निरोगी थे यदपि, तो भी अल्पाहार । तप जीवन का अंग था, औषध का परिहार । । * १४७ * मूलसूत्रम् - संसोहणं च वमणं च गायब्भंगणं सिणाणं च । संबाहणं न से कप्पे दंतपक्खालणं परिण्णाए । । पद्यमय भावानुवाद वमन विरेचन परिकर्म, मदर्न - मज्जन- त्याग । मंजन दाँतों का नहीं, नहीं देह - अनुराग ।। मूलसूत्रम् - मूलसूत्रम् - विरते य गामधम्मेहिं रीयति माहणे अबहुवादी । सिसिपि एगदा भगवं छायाए झाइ आसी य । पद्यमय भावानुवाद इन्द्रिय-विषयों से विरत, करते विचरण वीर । शिशिर - शीत छाया रहें, हुए न कभी अधीर । । १ । । मौन रहें बोलें नहीं, परमहंस अवधूत | जब भी बोलें बहुत कम, वे त्रिशला के पूत । । २ । । तप एवं आहार • आयावई य गिम्हाणं अच्छइ उक्कुडए अभिवाते । - अदु जावइत्थं लूहेणं ओयण-मंथु - कुम्मासेणं । ।
SR No.022583
Book TitleAcharang Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVijaysushilsuri, Jinottamsuri
PublisherSushil Sahitya Prakashan Samiti
Publication Year2000
Total Pages194
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_acharang
File Size41 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy