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है । देवता, प्रमेय और प्रमाण । श्रीराजशेखरसूस्जिी ने नौ तत्त्वों का निरूपण किया है । लिंग, (वेष से अतिरिक्त धर्मबोधक चिह्न) वेष, आचार, देवता, गुरु, प्रमाण, प्रमेय, मुक्ति, और तर्क (शास्त्र) । यहाँ गुरु द्वारा दिये जानावाला आशीर्वाद, आहार ग्रहण विधि खास करके सम्प्रदाय भेद आदि भी गौण रूप से वर्णित है । बृहवृत्तिकार आचार्यश्री गुणरत्नसूरिजी ने अपनी बृहवृत्ति में दर्शनीओं के वेषादि का निरूपण इसी ग्रन्थ के आधार पर किया है । आचार्यश्री स्वयं बहुत बड़े दार्शनिक थे। उन्होंने स्याद्वाद-कलिका, स्याद्वादरत्नाकरावतारिकापंजिका न्यायकंदली-पंजिका जैसी दार्शनिक कृतिओ की रचना भी की है।
जैन मत में श्वेताम्बर-दिगम्बर भेद - आचारभिन्नता का वर्णन, मीमांसक मत के चार प्रकार के परिव्राजक का वर्णन इस प्रकरण की विशेषता है । हालाँकि अद्वैत वेदान्त का तत्त्वनिरूपण इस कृति में भी समविष्ट नहीं है । पू. आ. श्री हरिभद्रसूरि ने चार्वाक को आंशिक रूपेण 'दर्शन' माना है । आ. श्रीराजशेखरसूरिजी स्पष्टरूपेण कहते हैं—'नास्तिकं तु न दर्शनम् । फिर भी उन्होंने नास्तिकदर्शन का तत्त्वनिरूपण अपने ग्रन्थ में किया है । प्रस्तुत सम्पादन :
विद्वान् आचार्यदेव श्रीमद्विजय जम्बू सू. म. सा.' एवम् साक्षर डॉ. महेन्द्रकुमार जैन द्वारा सम्पादित पुस्तक का सहारा लेकर यह सम्पादन सम्पन्न हुआ है । पू. आ. श्री राजशेखरसूरिजी कृत षड्दर्शनसमुच्चय पं. श्रावक हरगोविंददास और बेचरदास द्वारा सम्पादित है।
पू. आ. श्री विनय जम्बूसूरीश्वरजी म. सा. का सम्पादन अति समृद्ध और शुद्ध है । मलधारि श्रीराजशेखरसूरिजी कृत षड्दर्शनसमुच्चय का विशेष संशोधन अपेक्षित है। हस्तप्रतादि सामग्री के अभाव में यहाँ वह सम्भव नही हुआ है।
१. भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन । २. मुक्ताबाई ज्ञानमंदिर (१४) । ३. श्रीयशोविजय जैन ग्रन्थमाला (१७) ।