________________
श्री अष्टापद तीर्थ की स्तुति
,
जहाँ रत्नमय सममान चौबीस, बिम्ब सोहे प्रभु का हुआ मोक्ष कल्याणक तहाँ, पुत्र नाभि-नरेन्द्र का । जिन नाम बँधा रावणे, गौतम तरचा यात्रा कर ; उस तीर्थ अष्टापद गिरि को, वंदिये भक्तिपूर्ण ॥ १ ॥
श्री अष्टापद तीर्थ का चैत्यवन्दन
तीर्थ अष्टापदगिरि नमो, सोहे जगभर आज ; विश्वे महिमा मोटो तेहनो, वंदे सुर-नर राज ।। १ ।। एह गिरिवर ऊपरे, मोक्षकल्याणक जाणो अवसर्पिणीना प्रभु, ऋषभदेवनुं मानो ॥ २ ॥ भावी भरत चक्रीए, भरावेल ए तीर्थे मोहे ; रत्नमय बिंबो जिनना, चौबीसे सुन्दर सोहे ।। ३ ।।
राणी मन्दोदरी सहित ए, संगीत करतां स्नेहे ; तीर्थंकर नाम कर्मने, बाँध्युं रावणे त्यांहे ॥ ४ ॥
निज for लब्धिए जेवीने, जात्रा करे शुभ भावे ;
वीर विभु कहे गौतम ! प्रभवे ते मोक्षे जावे ।। ५ ।।
(१५)/