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________________ ७७ लिये प्रतिज्ञा, जिसका कि पहले लक्षण कह चुके हैं, और दोनों हेतुप्रयोगों से एक हेतुप्रयोग ये दो परार्थानुमानवाक्यके अवयव हैं; व्युत्पन्न श्रोताको इन दो अवयवोंसे ही अनुमान हो जाता है। नैयायिकास्तु परार्थानुमानप्रयोगस्य यथोक्ताभ्यां द्वाभ्यामवयवाभ्यां सममुदाहरणमुपनयो निगमनं चेति पश्चावयवानाहुः । तथाच ते सूत्रयन्ति "प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनान्यवयवाः" इति । तांश्च ते लक्षणपुरस्सरमुदाहरन्ति । तद्यथा-"पक्षवचनं प्रतिज्ञा, यथा पर्वतोयमग्निमानिति । साधनत्वप्रकाशनार्थ पञ्चम्यन्तं लिङ्गवचनं हेतुः,. यथा धूमवत्वादिति । नैयायिक परार्थानुमानप्रयोगके उक्त दोनों अवयवोंको स्वीकार करते हुए उदाहरण, उपनय, निगमन ये तीन अवयव और भी मानकर पांच अवयव मानते हैं । उनके यहांका यह सूत्र है कि "प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनान्यवयवाः" । इसका अर्थ-प्र. तिज्ञा हेतु उदाहरण उपनय निगमन ये पांच अनुमानके अवयव हैं । इन पांचों ही अवयवोंको वे लक्षणों तथा उदाहरणोंद्वारा इस प्रकार निरूपण करते हैं कि “पक्षके वचनको प्रतिज्ञा कहते हैं, जैसे कि यह पर्वत अग्निमान् है । साधनपना दिखानेके लिये, अर्थात् यह साध्यका साधक है यह दिखानेके लिये लिङ्गके पञ्चम्यन्त उच्चारणको हेतु कहते हैं, जैसे कि-क्योंकि यहांपर धूम है। व्याप्तिपूर्वकदृष्टान्तवचनमुदाहरणम् । यथा यो यो धूमवानसावसावनिमान्यथा महानसः। इति साधोदाहरणम् । यो योऽग्निमान्न भवति स स धूमवान भवति यथा महाहृदः। इति वैधर्योदाहरणम् । पूर्वत्रोदाहरणभेदे हेतोरन्वयव्याप्ति:
SR No.022438
Book TitleNyaya Dipika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBansidhar Shastri
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1913
Total Pages146
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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