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________________ ६० रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् जानने । भेद संघातके द्वारा इन तीनों स्कन्धोंके भेद परमागम में विशेषता कर गिने गये हैं. एक पृथ्वीपिंडमें ये चारों ही भेद होते हैं सकलपिंडका नाम स्कन्ध कहा जाता है आधेका नाम स्कन्धदेश चौथाईका नाम स्कन्धप्रदेश कहा जाता है अविभागीका नाम परमाणु कहा जाता है । इसी प्रकार खंड २ करने पर भेदोंसे अनन्ते भेद होते हैं. दो य परमाणुके मिलापसे लेकर सकल पृथ्वीखंड पर्यंत संघातकरि अनन्ते भेद होते हैं । भेद संघातसे पुद्गलकी अनन्तपर्यायें होती हैं । 1 आगें इन स्कंधोंका नाम पुद्गल कहा जाता है इस कारण पुद्गलका अर्थ दिखाते हैं. वादरसुहुमगदानां खंधाणं पुग्गलोत्ति ववहारो ॥ ते होंति छप्पयारा तेलोक्कं जेहिं णिप्पण्णं ॥ ७६ ॥ संस्कृतछाया. वादरसौक्ष्म्यगतानां स्कन्धानां पुद्गलः इति व्यवहारः ॥ ते भवन्ति षट्प्रकारास्त्रैलोक्यं यैः निष्पन्नं ॥ ७६ ॥ 1 पदार्थ – [ वादरसौक्ष्म्यगतानां ] वादर और सूक्ष्म परिणमनको प्राप्त भये हैं ऐसे जे [स्कन्धानां ] पुद्गल वर्गणा, तिनके पिंडका [ पुद्गलः ] पुद्गल [इति ] ऐसा नाम [व्यवहारः] लोकभाषामें कहा जाता है । भावार्थ - ये जो पूर्व में ही चार प्रकार के स्कन्धा - दिक भेद कहे इनमें पूरणगलन स्वभाव है इसकारण इनका नाम पुद्गल कहा जाता है । जो बढै घटै तिसको पुद्गल कहते हैं । परमाणु जो है सो अपने स्पर्शरसवर्णगन्ध गुणके भेदोंसे षट्गुणी हानिवृद्धिके प्रभावसे पुद्गल नाम पाता है । और उस ही परमाणुमें किसी कालमें स्कन्ध होने की प्रगट शक्ति है. जो कभी नहिं होती तो भी परमाणुको पुद्गल संज्ञा है | और तीन प्रकारके जो स्कन्ध हैं ते अनन्त परमाणुमिलकर एक पिण्ड अवस्थाको करते हैं । इसकारण उनमें भी पूरणगलन स्वभाव है और उनका भी नाम पुद्गल कहा जाता है [ते] वे पुद्गल [ षट्काराः ] छैप्रकारके [ भवन्ति ] होते हैं । [ यैः ] जिन पुद्गलोंसे [त्रैलोक्यं ] तीन लोक [ निष्पन्नं ] निर्मपित है । 1 1 I भावार्थ – वे छहप्रकारके पुद्गलस्कन्ध अपने स्थूल सूक्ष्म परिणामों के भेदोंसे तीन लोककी रचनामें प्रवर्त्तते हैं - वे छह प्रकार कौन २ से हैं सो बताये जाते हैं । वादरवादर १ वादर २ वादरसूक्ष्म ३ सूक्ष्मवादर ४ सूक्ष्म ५ सूक्ष्मसूक्ष्म ६ ये छह प्रकार जानने जो पुद्गल पिंड दो खण्ड करने पर अपने आप फिर नहिं मिलें ऐसे काष्ठपाषाणादिकको वादरवादर कहते हैं. १. और जो पुद्गलस्कन्ध खण्ड खण्ड किये हुये अपने आप मिल जांय ऐसे दुग्ध घृत तैलादिक पुद्गलोंको वादर कहते हैं २. और जो देखनेमें तो थूल होंहिं खण्ड खण्ड करनेमें नहिं आवें हस्तादिकसे ग्रहण करनेमें नहिं आवें ऐसे धूप चन्द्रमाकी चांदनी आदिक पुद्गल वादरसूक्ष्म कहलाते हैं ३. और जो स्कंध तो हैं सूक्ष्म, परन्तु स्थूल से प्रति
SR No.022407
Book TitlePanchastikay Samaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorPannalal Bakliwal
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year1905
Total Pages184
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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