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________________ श्रीपञ्चास्तिकायसमयसारः। भावार्थ-पुद्गलद्रव्यका चार प्रकार परिणमन है। इन चार प्रकारके पुद्गल परिणामोंके सिवाय और कोई भेद नहीं हैं । इनके सिवाय अन्य जो कोई भेद हैं वे इन चारों भेदोंमें ही गर्भित हैं। आगें इन चार प्रकारके पुद्गलोंका लक्षण कहते हैं। खधं सयलसमत्थं तस्स दु अद्धं भणंति देसोत्ति ॥ अडडं च पदेशो परमाणू चेव अविभागी॥ ७५ ॥ संस्कृतछाया. स्कन्धः सकलसमस्तस्तस्य त्वर्ध भणन्ति देश इति ॥ अर्वार्द्ध च प्रदेशः परमाणुश्चैवाविभागी ॥ ७५ ।। पदार्थ-[स्कन्धः] पुद्गलकाय जो स्कन्ध भेद है सो [सकलसमस्तः] अनन्त समस्त परमाणुवोंका मिलकर एक पिण्ड होता है [तु] और [तस्य] उस पुद्गल स्कन्धका [अर्द्ध] अर्द्धभाग [देश इति ] स्कन्धदेश नामका [भणंति] अरहंतदेव कहते हैं [च] फिर [अार्द्ध ] तिस स्कन्धके आधेका आधा चौथाई भाग [स्कन्धप्रदेशः] स्कन्धप्रदेश नामका है [च एव] निश्चयसे [अविभागी] जिसका दूसरा भाग नहिं होता तिसका नाम [परमाणुः] पुद्गलपरमाणु कहलाता है । __भावार्थ-स्कन्ध, स्कन्धदेश, स्कन्धप्रदेश इन तीन पुद्गलस्कंधोंमें अनन्त अनन्त भेद हैं. परमाणुका एक ही भेद है । दृष्टान्तके द्वारा इस कथनको प्रगट कर दिखाया जाता है। अनन्तानन्त परमाणुवोंके स्कन्धकी निसानी सोलहका अंक जानना. क्योंकि समझानेकेलिये थोड़ासा गणितकरके दिखाते हैं. सोलह परमाणुका तो उत्कृष्ट स्कन्ध कहा जाता है. उसके आगे एकएक परमाणु घटाते जाना. नवके अंकताई परमाणुवोंका जघन्य स्कन्ध है. नवसो पन्धरहसे लेकर दशताई मध्यम भेद जानने । इसी प्रकार स्कन्धके भेद एक एक परमाणुकी कमीसे अनन्त जानने । और आठ परमाणुका उत्कृष्ट स्कन्धदेश जानना. पांच परमाणुका जघन्य स्कन्धदेश जानना. सातसे लेकर छह ताई मध्यम स्कन्धदेशके भेद जानने. इसीप्रकार एक एक परमाणुकी कमीसे स्कन्धदेशके भेद अनन्त जानने । तथा चार परमाणुका उत्कृष्ट स्कन्धप्रदेश जानना-दो परमाणुवोंका जघन्य स्कन्धप्रदेश होता है. तीनसे लेकर मध्यम स्कन्धप्रदेशके भेद होते हैं. इसीप्रकार स्कन्धप्रदेश भेद एक एक परमाणुकी कमी कर जघन्य मध्यम उत्कृष्ट भेदोंसे अनन्त जानने। और परमाणु अविभागी है. इसमें भेद कल्पना नहीं है । ये चार प्रकार तो भेदकेद्वारा जानने-और ये ही चार भेद मिलापकेद्वारा भी गिने जाते हैं । मिलाप नाम संघातका है-दो परमाणुके मिलनेसे जघन्य स्कन्धप्रदेश होता है इसी प्रकार एक एक अधिक परमाणु मिलानेसे इन तीन स्कन्धोंके भेद उत्कृष्ट स्कन्ध ताई .
SR No.022407
Book TitlePanchastikay Samaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorPannalal Bakliwal
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year1905
Total Pages184
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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