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________________ समयसारः। परिवर्तितमेतद्वस्त्रं मामकमित्यसकृद्वाक्यं शृण्वन्नखिलैश्चिन्हैः सुष्टु परीक्ष्य निश्चितमेतत्परकीयमिति ज्ञात्वा ज्ञानी सन्मुंचति तच्चीवरमचिरात् तथा ज्ञातापि संभ्रांत्या परकीयान्भावानादायात्मीयप्रतिपत्त्यात्मन्यध्यास्य शयानः स्वयमज्ञानी सन् गुरुणा परभावविवेक कृत्वैकीक्रियमाणो मंक्षु प्रतिबुध्यस्खैकः खल्वयमात्मेत्यसकृच्छ्रौतं वाक्यं शृण्वन्नखिलैश्चिह्नः सुष्ठु परीक्ष्य निश्चितमेते परभावा इति ज्ञात्वा ज्ञानी सन् मुंचति सर्वान्भावानचिरात् । “अवतरति न यावद् वृत्तिमत्यंतवेगादनवमपरभावत्यागदृष्टांतदृष्टिः । झटिति सकलभावैरन्यदीयैर्विमुक्ता खयमियमनुभूतिस्तावदाविर्बभूव ॥ २९ ॥" ॥ ३५॥ नबलेन विशेषेण त्रिशुद्ध्या विमुंचति त्यजति स्वसंवेदनज्ञानीति । अयमत्र भावार्थः-यथा कश्चिदेवदत्तः परकीयचीवरं भ्रांत्या मदीयमिति मत्वा रजकगृहादानीय परिधाय च शयानः सन् पश्चादन्येन वस्त्रस्वामिना वस्त्रांचलमादायाच्छोद्य नग्नीक्रियमाणः सन् वस्त्रलांच्छनं निरीक्ष्य परकीयमिति मत्वा तद्वस्त्रं मुंचति तथायं ज्ञानी जीवोऽपि निर्विण्णेन गुरुणा मिथ्यात्वरागादिविभावा एते भवदीयस्वरूपं न भवंति एक एव त्वमिति प्रतिबोध्यमानः सन् परकीयानिति ज्ञात्वा मुंचति शुद्धात्मानुभूतिमनुभवतीति । एवं गाथाद्वयं गतं ॥ ३५ ॥ अथ कथं शुद्धात्मानुभूतिमनुभवतीति वचन कहा । सो सुनता हुआ उस वस्त्रके चिह्न सब देख परीक्षाकर ऐसा जाना कि 'यह वस्त्र तो दूसरेका ही है' ऐसा जानकर ज्ञानी हुआ उस दूसरेके कपड़ेको शीघ्र ही त्यागता है । उसीतरह ज्ञानी भी भ्रमसे परद्रव्यके भावोंको ग्रहणकर अपने जान आत्मामें एकरूपकर सोता है, वेखबर हुआ आपहीसे अज्ञानी हो रहा है । जब श्रीगुरु इसको सावधान करें परभावका भेद ज्ञान कराके एक आत्मभावरूप करें और कहैं कि " तू शीघ्र जाग सावधान हो यह तेरा आत्मा है वह एक ज्ञानमात्र है अन्य सब परद्रव्यके भाव हैं." तब वारंवार यह आगमके वाक्य सुनता हुआ समस्त अपने परके चिन्होंसे अच्छीतरह परीक्षाकर ऐसा निश्चयकर सकता है कि मैं एक ज्ञानमात्र हूं अन्य सब परभाव हैं । ऐसें ज्ञानी होकर सब परभावोंको तत्काल छोड़ देता है ।। भावार्थ-जबतक परवस्तुको भूलकर अपनी जानता है तबतक ही ममत्व रहता है और जब यथार्थ ज्ञान हो जानेसे परको पराई जाने तब दूसरेकी वस्तुसे ममत्व नहीं रहता यह बात प्रसिद्ध है ।। अब इसी अर्थका कलशरूपकाव्य कहते हैं । अवतरति इति । अर्थ-यह परभावके त्यागके दृष्टांतकी दृष्टि जिसतरह पुरानी न पडै उसतरह अयंतवेगसे जबतक प्रवृत्तिको नहीं प्राप्त हो उसके पहले ही तत्काल सकल अन्यभावोंकर रहित आप ही यह अनुभूति तो प्रगट हो जाती है । भावार्थ-यह परभावके त्यागका दृष्टांत कहा उसपर दृष्टि पड़े उससे पहले सब अन्यभावोंसे रहित अपने स्वरूपका अनुभव तो तत्काल हो ही जाता है क्योंकि यह प्रसिद्ध है कि जब बस्तुको परकी जान ली तब उसके वाद ममत्व नहीं रहता ॥ ३५ ॥
SR No.022398
Book Titlesamaysar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherJain Granth Uddhar Karyalay
Publication Year1919
Total Pages590
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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