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* कालतत्त्व : प्राचीन संदर्भ 'काल' के सम्बन्ध में जैन और वैदिक, दोनों दर्शनी में करीब ढाई हज़ार वर्ष पहले से दो पक्ष चले आते हैं। श्वेताम्बर ग्रन्थों में दोनों पक्ष वर्णित हैं। दिगम्बर ग्रन्थों में एक ही पक्ष नज़र आता है। ___ (१) पहला पक्ष, काल को स्वतन्त्र द्रव्य नहीं मानता। वह मानता है कि जीव और अजीव द्रव्य का पर्यायप्रवाह ही 'काल' है। इस पक्ष के अनुसार जीवाजीवद्रव्य का पर्यायपरिणमन ही उपचार से काल माना जाता है। इसलिये वस्तुतः जीव और अजीव को ही कालद्रव्य समझना चाहिये। वह उनसे अलग तत्त्व नहीं है। यह पक्ष ‘जीवाभिगम' आदि आगमों में है। ___ (२) दूसरा पक्ष काल को स्वतन्त्र द्रव्य मानता है। वह कहता है कि जैसे जीव-पुद्गल आदि स्वतन्त्र द्रव्य हैं, वैसे ही काल भी। इसलिये इस पक्ष के अनुसार काल को जीवादि के पर्यायप्रवाहरूप न समझ कर जीवादि से भिन्न तत्त्व ही समझना चाहिये। यह पक्ष 'भगवती' आदि आगमों में है।
आगम के बाद के ग्रन्थो में, जैसे :- तत्त्वार्थसूत्र में वाचक उमास्वाति ने, द्वात्रिंशिका में श्रीसिद्धसेन दिवाकर ने विशेषावश्यकभाष्य में श्रीजिनभद्रगणिक्षमाश्रमण ने, धर्मसंग्रहणि में श्रीहरिभद्रसूरि ने, योगशास्त्र में श्रीहेमचन्द्रसूरि ने, द्रव्य-गुण-पर्याय के रास में श्रीउपाध्याय यशोविजयजी ने, लोकप्रकाश में श्रीविनयविजयजी ने और नयचक्रसार तथा आगमसार में श्रीदेवचन्द्रजी ने आगमगत उक्त दोनों पक्षों का उल्लेख किया है। दिगम्बर संप्रदाय में सिर्फ दूसरे पक्ष का स्वीकार है, जो सबसे पहिले श्रीकुन्दकुन्दाचार्य के ग्रन्थों में मिलता है। इसके बाद पूज्यपादस्वामी, भट्टारक श्रीअकलंकदेव, विद्यानन्दस्वामी, नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती और बनारसीदास आदि ने भी उस एक ही पक्ष का उल्लेख किया है।
पहले पक्ष का तात्पर्य :- पहला पक्ष कहता है कि समय, आवलिका, मुहूर्त, दिन-रात आदि जो व्यवहार, कालसाध्य बतलाये जाते हैं, या नवीनता-पुराणता, ज्येष्ठता-कनिष्ठता आदि जो अवस्थाएँ, कालसाध्य बतलायी जाती हैं, वे सब क्रियाविशेष (पर्यायविशेष) के ही संकेत हैं। जैसे :- जीव या अजीव का जो पर्याय अविभाज्य है, अर्थात् बुद्धि से भी जिसका दूसरा हिस्सा नहीं हो सकता, उस आखिरी अतिसूक्ष्म पर्याय को 'समय' कहते हैं। ऐसे असंख्यात पर्यायों के पुञ्ज को ‘आवलिका' कहते हैं। अनेक आवलिकाओं को 'मुहूर्त' और तीस मुहूर्त को 'दिन-रात' कहते हैं। दो पर्यायो में से जो पहले हुआ हो वह ‘पुराण' और जो पीछे से हुआ हो वह 'नवीन' कहलाता है। दो जीवधारियो में से जो पीछे से जनमा हो वह 'कनिष्ठ' और जो पहिले जनमा हो, वह 'ज्येष्ठ' कहलाता है। इस प्रकार विचार करने से यही जान पड़ता है कि समय, आवलिका आदि सब व्यवहार और नवीनता आदि सब अवस्थाएँ, विशेष-विशेष प्रकार के पर्यायों के ही अर्थात् निर्विभाग पर्याय और उनके छोटे -बड़े बुद्धिकल्पित समूहों के ही संकेत हैं। पर्याय, यह जीव-अजीव की क्रिया है, जो किसी तत्त्वान्तर की प्रेरणा के सिवाय ही हुआ करती है। अर्थात् जीव-अजीव दोनों अपने-अपने पर्यायरूप में आप ही