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॥ चतुर्थसंज्ञाद्वारवर्णनम् ॥
(१७)
संज्ञा मेळवतां १० संज्ञाओ पण कही छे. त्यां मतिज्ञानावरणना क्षयोपशमथी शब्द अने अर्थना विषयवाळी सामान्य अवबोधरूप क्रिया ते ओघसंज्ञा १ अने शब्द तथा अर्थनो विशेषावबोधक्रिया ते लोकसंज्ञा, २ (इति प्रव० सारो० वृत्ति). अथवा दर्शनोपयोग ते ओघसंज्ञा अने ज्ञानोपयोग ते लोकसंज्ञा (इति ठाणांग वृत्ति.) अथवा वल्लीनुं जमीन छोडीने भींत वंडी या वृक्ष इत्यादि पर चढवू इत्यादि ओघसंज्ञा, अने पुत्ररहितने सद्गति न होय, कूतरा ते यक्ष छे, ब्राह्मण ते देव छ, कागडा ते पूर्वज छे, मयूरीने मोरनी पांखना वायुथी अथवा मयूरनां आंसु चाटवाथी गर्भ रहे छे इत्यादि लोकोए स्वच्छंदमति कल्पनाथी उपजावेली कल्पना
ओ ते लोकसंज्ञा (इति आचारांग वृत्ति). ए १० संज्ञाओ कही. ____ तथा मोह-धर्म-सुख-दुःख-जुगुप्सा-ने शोक ए ६ संज्ञाओ श्री आचारांगजीमां कहेली होवाथी पूर्वोक्त १० साथे मेळवतां १६ संज्ञाओ पण थाय. जीव जे संज्ञी अथवा असंज्ञी कहेवाय छे ते ए ४-१० वा १६ संज्ञाओवडे नहिं, पण आगळ कहेवाती दीर्घकालिकी आदि संज्ञाओवडे संज्ञि असंज्ञिपणु कहेवाय छे. ___ एकेन्द्रिय जीवोमा बादर प्रत्येकवनस्पतिने अंगे १० संज्ञाओ लिंगरूपे नीचे प्रमाणे कही छे
१ वृक्षने जळनो आहार होय छे माटे एकेन्द्रियने आहारसंज्ञा.
२ लज्जालु नामनी वनस्पतिने हाथ अडाडवा जइए तो सं. कोचाइ जाय छे माटे एकेन्द्रियने भयसंज्ञा.
वेलडी पोताना तंतुओवडे वृक्षने वींटी लेछे तेथी ते एकेन्द्रियने परिग्रहसंज्ञा.
४ कुरुवक नामर्नु वृक्ष स्त्रीना आलिंगनवडे फळीभूत थाय के माटे एके०ने मैथुनसंज्ञा..