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________________ ॥ दंडकप्रणेतुः प्रभुनीप्रार्थना || (१४७) ए पूर्वोक्त २४ दंड विस्तरार्थः -- श्रीगजसारमुनि श्रीवीरप्रभुने प्रार्थना करे छे के अनादि काळथी परिभ्रमण करवा वडे करीने हवे मा हृदय बहु खेदवाळं उद्विग्न ( उदासीन ) थयेलुं छे माटे मनने अशुभ विकल्पमां प्रवर्ताववारूप मनदंड, मोक्षमार्गने प्रतिकूळ वचनो बोलवा रूप वचनदंड, अने मुक्तिमार्गने प्रतिकूल क्रियामां कायाने प्रवववा रूप कायदंड, ए ३ दंडना त्यागथी सहजे मलनारुं मोक्षपद मने शीघ्र आपो ए दंडकप्रकरणरूप श्री महावीर स्वामीनी स्तुतिनो अन्तिम परमार्थ ( सार ) जणाव्यो. अवतरण – आ गाथार्मा श्री ग्रंथकारनी प्रशस्ति छे. सिरिजिणहंसमुणीसर - रज्जे सिरिधवलचंद सीसेण गजसारेण लिहिया, एसा विन्नत्ति अप्पहिया ॥ ४४ ॥ ॥ संस्कृतानुवाद | श्रीजिनहंस मुनीश्वरराज्ये, श्रीधवलचंद्र शिष्येण । गजसारेण लिखिता: एषा, विज्ञप्ति रात्महिता ॥ ४४॥ ॥ शब्दार्थः ॥ - सिरि-श्री जिणहंस - जिनहंसनामना मुणीसर — आचार्यना रज्जे - राज्यमां सिरि-श्री धवलचंद - धवलचंद्र गाथार्थः - श्री जिनहंसनामे आचार्यना राज्यमां (शासनमः श्री धवलचंदमुनिना शिष्य गजसार मुनिए आ विज्ञप्ति आत्म हितकारी लखी छे. सीसेण - शिष्ये गजसारेण - गजसारमुनीए लिहिया — लखी एसा - आ विभत्ति - विज्ञप्ति अपहिया - आत्महितकारी
SR No.022358
Book TitleDandak Prakaranam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGajasarmuni, Vijayodaysuri
PublisherGranth Prakashak Sabha
Publication Year1925
Total Pages222
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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