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________________ ओं ह्रीं क्रों वास्तुदेवाय इदमित्यादि..................."स्वाहा । आयात भो वातकुमारदेवाः प्रभोर्विहारावसराप्तसेवाः। यज्ञांशमभ्येत सुगंधिशीतमृद्धात्मना शोथयताध्वरोर्वीम् ।। १३१॥ 'ओं ह्रीं वायुकुमाराय सर्वविघ्नविनाशनाय महीं पूतां कुरु कुरु हूं फट् स्वाहा। दर्भपूलेन भूमिका संमार्जयेत् । आयात भो मेघकुमारदेवाः प्रभोर्विहारावसराप्तसेवाः । गृह्णीत यज्ञांशमुदीणशंपा गंधोदकैः प्रोक्षत यज्ञभूमिम् ॥ १३२॥ ओं ह्रीं मेघकुमाराय धरां प्रक्षालय प्रक्षालय अं हं सं वं झं यः क्षः फट् स्वाहा । दर्भपूलोपात्तजलेन भूमिं सिंचेत् । आयात भो वह्निकुमारदेवा आधानविध्यादिविधेयसेवाः । भजध्वमिज्यांशमिमा मखोवीं ज्वालाकलापेन परं पुनीत॥ १३३ ॥ इत्यादि श्लोक तथा “ओं ह्रीं” बोलकर वास्तुदेवको जल आदि आठ द्रव्य चढावे ॥१३०॥ “ आयात भोः" इत्यादि तथा ओं ह्रीं बोलकर वायुकुमारको जलादि चढावे । दर्भकी वुहारीसे भूमिको शुद्ध करे ॥ १३१ ॥ “ आयात भो " इत्यादि और 'ओं ह्रीं' इत्यादि कहकर मेघकुमारको बुलावे; फिर दर्भके पूलेसे जल लेकर छिडके ॥ १३२ ॥ " आयातभोः वह्नि"
SR No.022357
Book TitlePratishtha Saroddhar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAshadhar Pandit, Manharlal Pandit
PublisherJain Granth Uddharak Karyalay
Publication Year1918
Total Pages298
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size21 MB
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