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________________ ११२ गुरुवंदन जाप्य अर्थसहित. मस्तक नमारुवुं, ( करदि के० ) केटला (व के० ) वली (श्रावस्तएहिं के० ) श्रावश्यकें क रीने (परि के० ) परिशुद्ध को तथा ( क दोस विमुक्कं के० ) केटला दोषें करी विप्रमुक्त एटले रहित थके ( कीस के० ) शामा ( किरई के० ) करी ( किइकम्मं के० ) कृतिकर्म वांदणां दीजें ? वा शब्द पुनर्वाचक बे ॥ ६ ॥ ए पांच गाथा आवश्यक निर्युक्तिमां क मी दी बे ते इहां कही ॥ दवे ऋण गाथायें करी वंदनानां बावीश हार कहे बे. मूलदार गाहा ॥ पण नाम पणाहरणा, प्रजुग्गपण जुग्गपण चनप्रदाया || चन दाय पण निसेहा, चना सिह कारण या ॥ ७ ॥ प्रवस्सय मुहांतय, तापेह पलिस दोस बत्तीसा ॥ ब गुण गुरु ठवण डुग्गह, उबवी सस्कर गुरु पणीसा ॥ ८ ॥ पय प्रवन्न ग्ठाणा, व गुरु वयणा प्रा 4
SR No.022326
Book TitleChaityavandanadi Bhashya Trayam Balavbodh Sahit
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDevendrasuri
PublisherUnknown
Publication Year
Total Pages332
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
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