SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 91
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ५४ मूलाचारजा गदी वीदमोहाणं सामे भवदु सव्वदा ॥ ११६ ॥ या गतिः अर्हतां निष्ठितार्थानां या गतिः । या गतिः वीतमोहानां सा मे भवतु सर्वदा॥११६ ॥ अर्थ-जो अरहंतोंकी गति है, जो सिद्धोंकी गति है, जो वीतरागछद्मस्थोंकी गति है वही गति सर्वदा ( हमेशा ) मेरी भी हो । यही आराधनाका फल चाहता हूं अन्य नहीं ॥ ११६ ॥ __आगे उत्तमार्थ त्यागका फल कहते हैं;एगं पंडियमरणं छिंददि जादीसदाणि बहुगाणि । तं मरणं मरिदव्वं जेण मदं सुम्मदं होदि ॥ ११७ ।। एकं पंडितमरणं छिनत्ति जातिशतानि बहूनि । तन्मरणेन मर्तव्यं येन मृतं सुमृतं भवति ॥ ११७॥ अर्थ-एक भी पंडितमरण सैकडों जन्मोंका छेदनेवाला है, इसलिये ऐसा मरण करना चाहिये जिससे कि मरना अच्छा मरण कहलावे अर्थात् फिर जन्म नहीं धारण करना पडे ॥११७॥ - आगे मरणकालमें समाधिधारणका फल कहते हैं;एगम्हिय भवगहणे समाहिमरणं लहिज जदि जीवो। सत्तभवग्गहणे णिव्वाणमणुत्तरं लहदि ॥ १९८॥ एकसिन् भवग्रहणे समाधिमरणं लभते यदि जीवः । सप्ताष्टभवग्रहणे निर्वाणमनुत्तरं लभते ॥ ११८ ॥ अर्थ-जो यह जीव एक ही पर्यायमें संन्यास मरणको प्राप्त हो जाय तो सात आठ पर्यायें वीत जानेपर अवश्य मोक्षको पाता है ॥ ११८ ॥ यहां भावलिंगीकेलिये ही कहागया है। आगे शरीरके होनेसे ही जन्ममरणादि दुःख होते हैं
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy