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________________ संक्षेपप्रत्याख्यानाधिकार ३ । आगे संक्षेप प्रत्याख्यान करनेका क्रम बतलाते हैं;-. सव्वं पाणारंभं पच्चक्खामि अलीयवयणं च । सव्वमदत्तादाणं मेहुण्ण परिग्गहं चेव ॥ १०९ ॥ सर्व प्राणारंभं प्रत्याख्यामि अलीकवचनं च । सर्वमदत्तादानं मैथुनं परिग्रहं चैव ॥ १०९ ॥ अर्थ-संक्षेपतर प्रत्याख्यान करनेवाला ऐसे प्रतिज्ञा करता है कि पहले तो मैं सब हिंसाका, झूठ बोलनेका, चोरीका; मैथुनका तथा सब आभ्यंतर बाह्य परिग्रहका प्रत्याख्यान (त्याग) करता हूं । भावार्थ-प्रथम तो महाव्रतोंकी शुद्धि करनी चाहिये ॥ १०९॥ आगे सामायिकबतके स्वरूपका वर्णन करते हैं;सम्मं मे सव्वभूदेसु वेरं मज्झं ण केणवि । आसाए वोसरित्ताणं समाधि पडिवजइ॥११०॥ साम्यं मे सर्वभूतेषु वैरं मम न केनापि । आशाः व्युत्सृज्य समाधि प्रतिपद्ये ॥११० ॥ अर्थ—मेरे सब जीवोंमें समभाव हैं, मेरा किसीके साथ वैर नहीं है। इसलिये मैं सब आकांक्षाओंको छोड़ समाधि (शुद्ध) परिणामको प्राप्त होता हूं ॥ भावार्थ-सब जीवोंमें समभाव रखना, वैरभाव किसीके ऊपर न रखना, सब आशाओंको छोड़ना और समाधिभावको प्राप्त होना-इसीका नाम सामायिक है ॥ ११० ॥ __ आगे परिणाम शुद्धिके लिये फिर भी कहते हैं;सव्वं आहारविहिं सण्णाओ आसए कसाए य ।
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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