SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 65
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ २४ मूलाचारअर्थ-अहैत भट्टारक और गणधरदेव मरण तीन प्रकारका कहते हैं-बालमरण १ बालपंडितमरण २ और तीसरा पंडितमरण जोकि केवली भगवान्का मरण होता है ॥ भावार्थ-. असंयमी सम्यग्दृष्टीके मरणको बालमरण कहते हैं, संयतासंयतश्रावकके मरणको बालपंडितमरण कहते हैं, और तीसरा पंडितमरण संयमी मुनिके होता है । अन्य ग्रंथोंमें मरणके पांच भेद कहे गये हैं उनमेंसे बालबाल मरण मिथ्यात्वीके होता है और पंडित पंडित मरण केवलीके होता है ऐसा जानना ॥ ५९ ॥ __ आगे अज्ञानी कैसा मरण करते हैं उसका उत्तर कहते हैं;जे पुण पणहमदिया पचलियसण्णाय वक्कभावा य । असमाहिणा मरते ण हु ते आराहया भणिया ॥६॥ ये पुनः प्रनष्टमतिकाः प्रचलितसंज्ञाश्च वक्रभावाश्च । असमाधिना नियंते न हि ते आराधका भणिताः॥६०॥ अर्थ-जो नष्टबुद्धिवाले अज्ञानी आहारादिकी वांछारूप संज्ञाचाले मन वचन कायकी कुटिलतारूप परिणामवाले जीव आर्तरौद्रध्यानरूप असमाधिमरणकर परलोकमें जाते हैं वे आराधक (कर्मके क्षय करनेवाले ) नहीं हैं संसारको बढानेवालेही होते हैं ॥ ६० ॥ आगे पूछते हैं कि मरणके समय विरुद्ध परिणाम होनेसे क्या होता है उसे कहते हैंमरणे बिराधिदे देवदुग्गई दुल्लहा य किर बोही। संसासे य अणंतो सेइ पुणो आगमे काले ॥६१॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy