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मूलगुणाधिकार १। आगे क्षितिशयनव्रतका खरूप कहते हैंफासुयभूमिपएसे अप्पमसंथारिदम्हि पच्छण्णे । दंडंधणुव्व सेजं खिदिसयणं एयपासेण ॥ ३२॥
प्रासुकभूमिप्रदेशे अल्पासंस्तरिते प्रच्छन्ने । दंड धनुरिव शय्या क्षितिशयनं एकपाश्रुण ॥ ३२ ॥
अर्थ-जीवबाधारहित, अल्पसंस्तररहित, असंजमीके गमनरहित-गुप्त भूमिके प्रदेशमें दंडे के समान अथवा धनुषके समान एक पसवाड़ेसे सोना वह क्षितिशयन मूलगुण है ॥ ३२॥
आगे अदंतमनव्रतका स्वरूप कहते हैंअंगुलिणहावलेहणिकलीहिं पासाणछल्लियादीहिं। दंतमलासोहणयं संजमगुत्ती अदंतमणं ॥ ३३ ॥
अंगुलिनखावलेखनीकलिभिः पाषाणत्वचादिभिः । दंतमलाशोधनं संयमगुप्तिरदंतमनम् ॥ ३३ ॥
अर्थ-अंगुली, नख, दांतौन, तृणविशेष, पैनी कंकणी, वृक्षकी छाल, ( वक्कल), आदिकर दांतमलको नहीं शुद्धकरना अर्थात् दांतोंन नहीं करना वह इंद्रियसंयमकी रक्षाकरनेवाला अदंतमन मूलगुणव्रत है ॥ ३३ ॥ __ आगे स्थितिभोजनव्रतका खरूप कहते हैं;-- अंजलिपुडेण ठिचा कुड्डादिविवजणेण समपायं । पडिसुद्धे भूमितिए असणं ठिदिभोयणं णाम ॥ ३४॥ . अंजलिपुटेन स्थित्वा कुड्यादिविवर्जनेन समपादम् । परिशुद्धे भूमित्रिके अशनं स्थितिभोजनं नाम ॥ ३४ ॥ अर्थ-अपने हाथरूप भाजनकर भीत आदिके आश्रय