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________________ ३९६ मूलाचारएइंदिया य जीवा अमणाय अभासया होंति ॥११२७ द्वीन्द्रियादीनां भाषा भाषा च मनश्च संज्ञिकायानां । एकेंद्रियाश्च जीवा अमनस्का अभाषका भवंति ॥११२७॥ अर्थ-दोइंद्रियसे लेकर असैनी पंचेंद्रीतक वचनयोग है, संज्ञी पंचेंद्रीके वचनयोग और मनोयोग है एकेंद्रिय जीवोंके मनोयोग वचन योग नहीं है केवल काययोग है । काययोग सबके जानना चाहिये ॥ ११२७ ॥ एइंदिय विगलिंदिय णारय सम्मुच्छिमा य खलु सव्वे। वेदे णपुंसगा ते णादव्वा होंति णियमादु ॥११२८ ॥ एकेंद्रिया विकलेंद्रिया नारकाःसंमूर्छनाश्च खलु सर्वे । वेदेन नपुंसकास्ते ज्ञातव्या भवंति नियमात् ॥ ११२८ ॥ अर्थ-एकेंद्रिय दो तीन चार इंद्रिय नारकी संमूर्छन जन्मवाले असंज्ञी संज्ञी पंचेंद्रिय वेदकर नपुंसकलिंग नियमसे होते हैं ऐसा जानना चाहिये ॥ ११२८ ।। देवा य भोगभूमा असंखवासाउगा मणुवतिरिया। ते होंति दोसु वेदेसु णत्थि तेसिं तदियवेदो॥११२९॥ देवाश्च भोगभूमा असंख्यवर्षायुषः मनुष्यतिर्यंचः। ते भवंति द्वयोः वेदयोः नास्ति तेषां तृतीयवेदः॥११२९॥ अर्थ-भवनवासी आदि देव असंख्यात वर्षकी आयुवाले भोमभूमिया मनुष्य तिर्यंच इनके पुल्लिंग स्त्रीलिंग ये दो ही वेद होते हैं नपुंसकवेद नहीं है ॥ ११२९ ॥ पंचेंदिया दु सेसा सण्णि असण्णी य तिरिय मणुसाय। ते होंति इत्थिपुरुसा णपुंसगा चावि वेदेहिं ॥११३०॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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