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________________ ३७३ पर्याप्ति-अधिकार १२। नैवास्थीनि नैव सिरा देवानां शरीरसंस्थाने ॥ १०५२ ॥ अर्थ-देवोंके शरीरके आकारमें बाल नख डाढी मूछ रोम चमड़ा मांस लोही मूत्र विष्ठा हड्डी नसोंका जाल-ये सब नहीं होते हैं ॥ १०५२ ॥ वरवण्णगंधरसफासा दिव्वं बहुपोग्गलेहिं णिम्माणं । गेण्हदि देवो देहं सुचरिदकम्माणुभावेण ॥१०५३ ॥ वरवर्णगंधरसस्पर्शेः दिव्यबहुपुद्गलैश्च निर्मितं । गृह्णाति देवो देहं सुचरितकर्मानुभावेन ॥ १०५३ ॥ अर्थ-जिनके श्रेष्ट रूप गंध रसस्पर्श हैं ऐसे दिव्य वैक्रियिकवर्गणाके अनंत पुद्गलोंसे बने हुए शरीरको पूर्व उपार्जन किये शुभकर्म के प्रभावसे वह देव ग्रहण करता है ॥ १०५३ ॥ वेगुम्वियं सरीरं देवाणं माणुसाण संठाणं । सुहणाम पसत्थगदी सुस्सरवयणं सुरूवं च॥१०५४॥ वैक्रियिकं शरीरं देवानां मनुष्याणां संस्थानं । शुभनाम प्रशस्तगतिः सुखरवचनं सुरूपं च ॥ १०५४ ॥ अर्थ-देवोंका शरीर विक्रियायुक्त होनेसे वैक्रियिक है मनुष्यों के समान पहला समचतुरस्र संस्थान होता है, शुभनाम प्रशस्तगमन सुखरवचन सुरूप ये भी होते हैं ॥ १०५४ ॥ पढमाए पुढवीए रइयाणं तु होइ उस्सेहो। सत्तधणु तिण्णिरयणी छच्चेव य अंगुला होति॥१०५५ प्रथमायां पृथिव्यां नैरयिकाणां तु भवति उत्सेधः । सप्त धनूंषि त्रिरत्नयः षट् एव च अंगुला भवंति ॥१०५५॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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