SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 401
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ३६४ मूलाचारअर्थ-हिंसा झूठ चोरी अब्रह्म परिग्रह क्रोध मान माया लोभ भय अरति रति जुगुप्सा मनोमंगुल वचनमंगुल कायमंगुल मिथ्यादर्शन प्रमाद पैशून्य अज्ञान इंद्रियोंका अनिग्रह-ये हिंसादि इक्कीस भेद हैं ॥ १०२४-१०२५ ॥ अदिकमणं वदिक्कमणं अदिचारो तहेव अणाचारो। एदेहिं चतुहिं पुणो सावज्जो होइ गुणियव्वो ॥१०२६ अतिक्रमणं व्यतिक्रमणं अतीचारः तथैव अनाचारः। एतैः चतुर्भिः पुनः सावधो भवति गुणितव्यः ॥१०२६॥ अर्थ-संयमीकी विषयाभिलाषा अतिक्रमण है, विषयोपकरणका उपार्जन वह व्यतिक्रमण है, व्रतमें शिथिलता तथा कुछ असंयमका सेवन वह अतीचार है व्रतका सर्वथा भंग वह अनाचार है । इसतरह अतिक्रमादि चारको गुणा करना ॥ १०२६ ॥ पुढविदगागणिमारुयपत्तेयाणंतकाइया चेव । वियतियचदुपंचेंदियअण्णोण्णग्याय दसगुणिया । पृथिव्युदकानिमारुतप्रत्येकानंतकायिकाश्चैव । द्वित्रिचतुःपंचेंद्रिया अन्योन्यनाश्च दशगुणिताः ॥१०२७॥ .. अर्थ—पृथिवी जल अग्मि वायुकायिक प्रत्येकवनस्पति साधारणवनस्पतिकायिक, दो इंद्रिय तेइंद्री चौइंद्री पंचेंद्री इन दशको आपसमें गुणा करनेसे सौ होते हैं । फिर पहले चौरासी भेदोंसे गुणा करनेसे चौरासीसौ भेद हुए ॥ १०२७ ॥ इत्थीसंसग्गी पणिदरसभोयण गंधमल्लसंठप्पं । सयणासणभूसणयं छठें पुण गीयवाइयं चेव ॥१०२८ अत्थस्स संपओगो कुसीलसंसग्गि रायसेवा य ।
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy