SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 379
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ३४२ मूलाचारआलसी पीछे दोष कहनेवाला पिशुन हो, गुरुता कषाय बहुत रखता हो ऐसा साधु सेवने योग्य नहीं है ॥ ९५५ ॥ वेजावच्चविहीणं विणयविहूणं च दुस्सुदिकुसीलं । समणं विरागहीणं सुसंजमो साधु ण सेविज॥९५६॥ वैयावृत्त्यविहीनं विनयविहीनं च दुःश्रुतिकुशीलं । श्रमणं विरागहीनं सुसंयमो साधुन सेवेत ॥९५६ ॥ अर्थ-रोगी आदिकी सेवासे रहित, विनयरहित, खोटे शास्त्रोंकर कुआचरणी वैराग्यरहित ऐसे साधुको उत्तम चारित्रवाला साधु नहीं सेवे ॥ ९५६ ॥ दंभं परपरिवादं पिसुणत्तण पावसुत्तपडिसेवं । चिरपव्वइदंपि मुणी आरंभजुदं ण सेविज ॥९५७ ॥ दंभं परपरिवादिनं पिशुनं पापसूत्रप्रतिसेविनं । चिरप्रव्रजितमपि मुनि आरंभयुतं न सेवेत ॥ ९५७ ॥ अर्थ-जो ठगनेवाला हो, दूसरेको पीडा देनेवाला हो, झूठे दोषोंको ग्रहण करनेवाला हो, मारण आदि मंत्रशास्त्र अथवा हिंसापोषकशास्त्रोंका सेवनेवाला हो, आरंभ सहित हो ऐसे बहुत कालसे दीक्षित भी मुनिको सदाचरणी नहीं सेवे ॥ ९५७ ॥ चिरपव्वइदंवि मुणी अपुट्ठधम्मं असंपुडं णीचं । . लोइय लोगुत्तरियं अयाणमाणं विवजेज ॥ ९५८ ॥ चिरप्रव्रजितमपि मुनि अपुष्टधर्म असंवृतं नीचं । लौकिकं लोकोत्तरं अजानंतं विवर्जयेत् ॥ ९५८ ॥ अर्थ-जो मुनि बहुतकालसे दीक्षित भी हो परंतु मिथ्यात्व सहित हो स्वेच्छावचन बोलनेवाला हो नीच कामोंमें रत हो
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy