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________________ अनगारभावनाधिकार ९। यमराज ( काल ) मनुष्योंसे गुस्सा करसकता है अर्थात् मृत्यु भी उसको नहीं जीत सकती ॥ ८६८ ॥ जदिवि य करेंति पावं एदे जिणवयणबाहिरा पुरिसा। तं सव्वं सहिदव्वं कम्माण खयं करतेण ॥ ८६९ ॥ यद्यपि च कुर्वति पापं एते जिनवचनबाह्याः पुरुषाः। तत् सर्व षोढव्यं कर्मणां क्षयं कुर्वता ॥ ८६९ ॥ अर्थ-यद्यपि जिन वचनोंसे अलग हुए जो मिथ्यात्वी पुरुष मारना बांधना आदि पापकर्मोको करते हैं दुःख देते हैं तौभी जिसको कर्मोंका नाश करना है उस साधुको सब उपसर्ग सह लेने चाहिये ॥ ८६९ ॥ लभ्रूण इमं सुििहं ववसायविदिजयं तह करेह । जह सुग्गइचोराणं ण उवेह वसं कसायाणं ॥८७०॥ लब्ध्वा इमं श्रुतनिधिं व्यवसायद्वितीयं तथा कुरुत । यथा सुगतिचौराणां न उपैहि वशं कषायाणां ॥ ८७० ॥ अर्थ-इस द्वादशांग चौदहपूर्व श्रुतरूप खजानेको पाकर दूसरा यत्न ऐसा कर कि जिसतरह मोक्षमार्गके नाशक क्रोधादि कषायोंके वशमें न होसके ॥ ८७० ॥ पंचमहव्वयधारी पंचसु समिदीसु संजदा धीरा। पंचिंदियत्थविरदा पंचमगइमग्गया समणा ॥ ८७१॥ पंचमहाव्रतधारिणः पंचसु समितिषु संयता धीराः । पंचेंद्रियार्थविरताः पंचमगतिमार्गकाः श्रमणाः ॥ ८७१॥ अर्थ—जो पांच महाव्रतोंको धारते हैं पांच समितियोंमें लीन हैं धीर वीर हैं पांच इंद्रियोंके रूपादि विषयोंमें विरक्त हैं मोक्षग
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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