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________________ २६२ मूलाचारप्रकार अनेक दुःख ही जिसमें सार हैं ऐसे संसारको जानकर शीघ्र ही इसको निस्सार चितवन करना चाहिये ॥७०८-७१०॥ . अब लोकानुप्रेक्षाको कहते हैं;एगविहो खलु लोओ दुविहो तिविहो तहा बहुविहो वा दव्वेहिं पन्जएहिं य चिंतेज लोगसम्भावं ॥७११॥ एकविधः खलु लोकः द्विविधः त्रिविधः तथा बहुविधो वा। द्रव्यैः पर्यायैः च चिंतयेत् लोकसद्भावं ॥ ७११ ॥ अर्थ-यह लोक सामान्यकर एक है ऊर्ध्वअधोलोकसे दो प्रकार है तिर्यग्लोक मिलानेसे तीन भेदवाला है, गति अस्तिकाय द्रव्य पदार्थ कर्म इनकी अपेक्षा चार पांच छह सात आठ भेदवाला है-इसप्रकार द्रव्य तथा पर्यायभेदकर लोकके अस्तित्वका चितवन करे ॥ ७११ ॥ लोगो अकिहिमो खलु अणाइणिहणो सहावणिप्पण्णो जीवाजीवहिं भुडो णिचो तालरुक्खसंठाणो ॥७१२॥ लोकः अकृत्रिमः खलु अनादिनिधनः स्वभावनिष्पन्नः। जीवाजीवैः भृतः नित्यः तालवृक्षसंस्थानः ॥ ७१२ ॥ अर्थ-यह लोक अकृत्रिम है अनादिनिधन है अपने खभावसे स्थित है किसीकर बनाया हुआ नहीं है जीव अजीव द्रव्योंसे भरा हुआ है नित्य (सर्वकाल रहनेवाला) है और ताड़वृक्षके आकार है ॥ ७१२ ॥ धम्माधम्मागासा गदिरागदि जीवपुग्गलाणं च । जावत्तावल्लोगो आगासमदो परमणंतं ॥७१३ ॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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